प्रदेश सरकार के भविष्य पर चर्चाएं शुरू, मध्यप्रदेश कांग्रेस की इस ऐतिहासिक हार

भोपाल। यह सच है कि मोदी और उनके राष्ट्रवाद के आगे देशभर में कोई नहीं टिक पाया, लेकिन इस राज्य के अपने अंदरूनी और पार्टीगत कारण भी हैं। मप्र में नतीजे इसलिए भी हैरान करने वाले हैं कि यहां चंद महीने पहले ही कांग्रेस की सरकार बनी है और पिछले कुछ दशकों से 29 में से 28 सीटें किसी एक दल को मिली हों, ऐसा भी कोई उदाहरण नहीं है। कांग्रेस के नेता पूरे चुनाव में मोदी लहर को नकारते रहे और मोदी की सुनामी ने भाजपा को ऐतिहासिक जीत दिला दी।
पांच महीने पहले हुए मप्र विधानसभा चुनाव में भाजपा को 41 प्रतिशत वोट मिले थे और 17 लोकसभा क्षेत्रों में उसने बढ़त हासिल की थी, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अब तक की जीत और बढ़त के आधार पर 58 प्रतिशत वोट मिले हैं। यानी पांच महीने के भीतर उसने लगभग 17 प्रतिशत ज्यादा वोट हासिल किए हैं। इसके उलट कांग्रेस का वोट शेयर लगभग 6 प्रतिशत कम हो गया है। उसे विधानसभा चुनाव में 40.9 प्रतिशत वोट मिले थे, जो लोकसभा चुनाव में घटकर 34.56 प्रतिशत रह गए हैं।
कांग्रेस ने रणनीति बनाई थी कि कठिन सीटों पर बड़े नेताओं को उतारा जाए। इसीलिए दिग्विजय सिंह को भोपाल और विवेक तन्खा को जबलपुर सीट से लड़ाया गया।
भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को फ्री रखा और उन्होंने कई सभाएं कीं। कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने चुनावों में फंसे रहे।
इंदौर में सबसे आखिरी में शंकर लालवानी को टिकट मिला और फिर भी उन्होंने साढ़े पांच लाख वोट से ज्यादा की जीत हासिल की।
कांग्रेस अपने प्रचार में कर्जमाफी की बात करती रही, लेकिन नो ड्यूज सर्टिफिकेट और अपनी सरकार की योजनाओं को बंद करने का आरोप लगाकर शिवराज ने खासी सहानुभूति हासिल करने की कोशिश की।
पांच महीने के कार्यकाल में सरकार ने पूरा फोकस कर्जमाफी पर रखा और अन्य क्षेत्र के लिए कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया। इसका खामियाजा भी कांग्रेस को भुगतना पड़ा। थोक में किए गए तबादलों से भी सरकार की छवि खराब हुई।
बिजली कटौती और कर्मचारियों की नाराजगी भी कांग्रेस के लिए एक नकारात्मक पक्ष रहा।
अब आगे क्या
बाहरी समर्थन पर टिकी मप्र सरकार को लेकर चर्चा शुरू हो चुकी है। फ्लोर टेस्ट की मांग पहले ही उठ चुकी है और खरीद-फरोख्त की बातें भी चल रही हैं। मायावती के दो विधायक कांग्रेस के साथ कितने दिन जुड़े रहेंगे, यह भी एक बड़ा प्रश्न है। ऐसे में बहु-बलशाली रूप में केंद्र में आई भाजपा मध्यप्रदेश में ज्यादा दिन शांत बैठने वाली नहीं है। खतरा मंडरा रहा है।
दिग्विजय क्यों हारे : चूंकि बड़े नेताओं को महत्वपूर्ण सीटों से लड़ने का सुझाव सार्वजनिक तौर पर दिया गया। इसलिए दिग्विजय सिंह की मजबूरी हो गई भोपाल से लड़ने की। सब जानते हैं कि भोपाल सीट वर्षों से भाजपा की ही है। साध्वी प्रज्ञा को यहां से खड़ा कर भाजपा ने हिंदू कार्ड खेला। दिग्विजय सिंह इसलिए हारे। कांग्रेस ने उन्हें यहां से लड़ाकर राजगढ़ सीट गंवाई, सो अलग।
सिंधिया की हार के कारण : ज्योतिरादित्य सिंधिया की गुना से पराजय अपने आप मेें अनोखा नतीजा है। इसलिए कि गुना-ग्वालियर में सिंधिया परिवार कभी नहीं हारा। न राजमाता, न माधवराव। एक बार राजमाता हारी थीं, लेकिन रायबरेली से, मप्र से नहीं। माधवराव तो अटलजी तक को हरा चुके हैं। खुद ज्योतिरादित्य सिंधिया 2014 की मोदी लहर में जीत गए थे, इस बार वे एक अदने से भाजपा प्रत्याशी से हार गए। कारण निजी है। आप गांधी परिवार के बेहद करीब हैं, गुना आपकी रियासत होती थी।
लोग सिर्फ इसलिए वोट नहीं दे सकते। उनके बीच बैठना, मिलना, काम करना होता है। फिर जब आप महाराजा की तरह क्षेत्र में आते हैं तो लोग महाराज साहब तो कहते हैं, लेकिन लंबे समय तक आपको ही वोट देते रहें, यह जरूरी नहीं है।
वैसे भी ज्योतिरादित्य ने गुना से ज्यादा समय उत्तर प्रदेश में समय दिया। गुना ने भी उनके साथ वैसा ही किया। कमलनाथ के बेटे छिंदवाड़ा में अपने पिता के विकास कार्यों के बल पर ही कम अंतर से जीते हैं और यही सीट कांग्रेस के खाते में बच पाई है।

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