एम्स में होना था इलाज, फिर सफदरजंग कैसे पहुंच गई हाथरस की बेटी?

अलीगढ़। कुछ सवाल ऐसे हैं, जो हाथरस के चंदपा की अनुसूचित जाति की बेटी की मौत से पहले इलाज में हुई लापरवाही की ओर इशारा कर रहे हैं। इन लापरवाहियों के लिए जिम्मेदार या जवाबदेह कौन होगा? सबसे बड़ा सवाल है कि बेटी को टॉप क्लास सुविधाओं से युक्त एम्स रेफर किया गया था, मगर उसे एम्स ले जाने के बजाय सफदरजंग क्यों ले जाया गया? वहीं बेटी को तीन दिन पहले ही यहां से दिल्ली ले जाने का सुझाव मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने दिया था, मगर उसे तीन दिन बाद लेकर जाया गया? इन सवालों का किसी स्तर से सही जवाब नहीं मिल रहा है।

14 सितंबर को हुई इस घटना के बाद बेटी को जेएन मेडिकल कॉलेज लाकर भरती कराया गया। दो दिन के इलाज के बाद उसे हालत नाजुक होने पर वेंटिलेटर पर लिया गया। इसके बाद 26 सितंबर को बेटी को हायर सेंटर एम्स ले जाने का सुझाव मेडिकल कालेज के डॉक्टरों ने दिया। इस खबर पर हाथरस पुलिस के अधिकारियों से स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने वार्ता की। परिवार से बात हुई, मगर परिवार की ओर से यह कहकर सहमति नहीं दी गई कि वहां हम अकेले कैसे कर पाएंगे? उस समय एम्स के डॉक्टरों से बातचीत भी की गई। वहां से इशारा भी मिल गया कि इसे लेकर आ सकते हैं। इसके बाद अचानक 28 सितंबर की सुबह उसे एम्स रेफर किया गया। मगर एम्स के बजाय हाथरस जिला पुलिस उसे सफदरजंग लेकर पहुंच गई। वहां अगले 24 घंटे में ही उसने दम तोड़ दिया।
हाथरस की बेटी के उपचार के मामले में जेएन मेडिकल कॉलेज के द्वारा उसको एम्स दिल्ली के लिए रेफर किया गया था। क्योंकि जेएनएमसी का हायर रेफरल सेंटर एम्स है। वह सफदरजंग कैसे पहुंची इस बात का जवाब हाथरस जिला प्रशासन दे सकेगा। जहां तक पीड़ित को रेफर किए जाने में लगे समय का सवाल है तो यह फैसला किसी भी मामले में प्रमुख तौर से परिजनों के द्वारा लिया जाता है। डॉक्टर परिजनों को परामर्श दे सकते हैं, लेकिन अंतिम तौर पर फैसला परिजनों को लेना होता है। बिना डॉक्टर के परामर्श दिए भी परिजन अपनी ओर से फैसला ले सकते हैं। इसके साथ ही मेडिकल कॉलेज से जारी मेडिकल रिपोर्ट केवल जांच अधिकारी को या अदालत में प्रस्तुत की जाती है। अन्य किसी तीसरी अथॉरिटी को यह रिपोर्ट नहीं दी जाती है। पीड़ित से दुष्कर्म होने का जहां तक सवाल है तो जिला प्रशासन में इसके लिए एक टीम गठित की थी। इस टीम में अपनी रिपोर्ट शासन को भेज दी है। इस बनाई गई टीम में मेडिकल कॉलेज की कोई भी भूमिका नहीं है।- प्रोफेसर शाहिद अली सिद्दीकी प्रिंसिपल जेएन मेडिकल कॉलेज
जेएन मेडिकल कॉलेज प्रशासन की ओर से बेटी को सफदरजंग ले जाने के लिए रेफर किया था। हम अपनी मर्जी से लेकर नहीं गए। परिवार हमारे साथ था। पिता व भाई की सहमति से ही उसे वहां लेकर जाया गया। इलाज को लेकर हर कदम पर परिवार से सहमति ली गई थी। -प्रकाश कुमार, एएसपी, हाथरस

सोशल मीडिया पर वायरल मेडिकल रिपोर्ट का सच क्या है?
हाथरस की बेटी के शरीर की बाह्य चोटों के संबंध में जेएन मेडिकल कॉलेज में हुए परीक्षण से संबंधित एक पेज की रिपोर्ट उसकी मौत के बाद से अचानक वायरल हो रही है। इस परीक्षण रिपोर्ट का सच तो मेडिकल कॉलेज प्रशासन ही बताएगा, मगर इतना जरूर है कि इस रिपोर्ट में उसकी गर्दन पर गंभीर चोट के अलावा शरीर के किसी अन्य हिस्से में गंभीर चोट का उल्लेख नहीं है।
सोशल मीडिया ग्रुपों में एक पेज की जो रिपोर्ट वायरल हो रही है, उसमें बेटी के शरीर के 16 बाह्य हिस्सों का परीक्षण किया गया है, जिसमें सिर्फ गर्दन में चोट, कंधे पर हल्की खरोंच व आंख के पास एक खरोंच का निशान होना बताया गया है। वहीं एक अन्य चोट शरीर के पिछले हिस्से में है, जो पुरानी चोट है और अब सही हो गई है। इसमें जीभ काटने जैसा कोई उल्लेख नहीं है। इसकी सच्चाई को लेकर मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य प्रो.शाहिद अली सिद्दीकी का कहना है कि मेडिकल रिपोर्ट देने का प्रावधान विवेचक व कोर्ट को है। हमारे यहां से ऐसी कोई रिपोर्ट वायरल नहीं हुई है।

हाथरस की युवती का होना था एक टेस्ट, जिस की सुविधा अलीगढ़ में है ही नहीं
हाथरस की बेटी 14 दिन मेडिकल कॉलेज में रखे जाने और उसे दिल्ली या अन्य कहीं पर बेहतर उपचार के लिए रेफर न किए जाने पर अब सवाल उठ रहे हैं। यह भी बात निकल कर आई है कि युवती का मुंह में पाइप डाल कर एक विशेष किस्म का एमआरआई होना था जो सुविधा स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं है। माना जा रहा है कि उपचार में इस प्रकार की उदासीनता भी बिटिया की जान चले जाने का एक कारण बनी।

मंगलवार को नगर निगम में नगर सफाई मजदूर संघ के पदाधिकारियों ने यह बात उठाई थी। वहीं वरिष्ठ कांग्रेसी नेता इंजीनियर आगा यूनुस ने कहा कि बड़े अफसोस की बात है कि 14 सितंबर में जीवन के लिए संघर्ष करती पीड़ित और बेहाल परिवार मेडिकल कॉलेज में जूझता रहा। उन्होंने कहा कि परिवार की रिश्तेदार के साथ खुद डॉक्टर से मिला। डॉक्टर ने भी बताया एक जांच जो मेडिकल कॉलेज में है ही नहीं । मुंह में पाइप डालकर एमआरआई होना जरूरी बताया गया। लेकिन यह जांच मेडिकल कॉलेज और संभवत अलीगढ़ में उपलब्ध नहीं है। देश की बेटी जिसको सर्वोच्च इलाज प्रथम दिन से मिलना था उसमें देरी क्यों हुई? देश जवाब मांग रहा है।

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