कमजोर पड़ने लगा था धर्म, तब हुआ था इस अद्भुत बालक जन्म

सनातन संस्कृति के उत्थान और हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार का श्रेय आदि गुरु शंकराचार्य को दिया जाता है। धर्मगुरू और प्रचारक उन्हे शिव अवतार भी मानते हैं। वेद-शास्त्रों के ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने देशभऱ की यात्रा की और जनमानस को हिंदू धर्म और संस्कारों के बारे में बताया। उनके दर्शन ने सनातन संस्कृति को एक नई पहचान दी और भारतवर्ष के कोने कोने तक उन्होंने लोगों को वेदों के अहम ज्ञान से अवगत कराया।
इससे पहले धर्मविरोधी यह भ्रामक प्रचार कर रहे थे कि वेदों का कोई प्रमाण नहीं है और तीर्थाटन से कोई धर्म लाभ नहीं होता है इस तरह के दुष्प्रचार से सनातन धर्मावलंबियों में धर्म का असर तो कम हुआ ही साथ ही लोग धर्म से दूर होने लगे थे, जिससे सनातन संस्कृति का वजूद संकट में पड़ गया था । यज्ञ, पूजा-पाठ, हवन, तीर्थयात्रा आदि बंद होने लग गए थे। ऐसे मुश्किल हालात में केरल में एक अद्भुत बालक शंकर का जन्म हुआ जो बाद में आद्यशंकराचार्य के नाम से जगत में प्रसिद्ध हुआ।
मान्यता है कि जगदगुरू आदिशंकराचार्य का जन्म ढाई हजार वर्ष पूर्व हुआ था। आद्यशंकराचार्य के बारे में कहा जाता है कि
अष्टवर्षे चतुर्वेदी, द्वादशे सर्वशास्त्रविद् ।
षोडषे कृतवान भाष्यं, द्वात्रिशे मुनिरभ्यगात ।।
आठ वर्ष की उम्र में चार वेदों का ज्ञान, बारह वर्षों में सभी शास्त्रों का ज्ञान, सोलह वर्षों में भाष्य रचना और बत्तीस वर्ष की उम्र में महाप्रयाण ।
शंकराचार्य का जीवनकाल सिर्फ 32 साल का था। इस छोटी सी उम्र में उन्होंने तीर्थ, वर्ण, आश्रम आदि सनातन संस्कृति की व्यवस्थाओं को स्थापित कर वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना की । उनकी बनाई गई व्यवस्था अभी भी संतों और हिंदू समाज का मार्गदर्शन करती है।
देश के चार कोनों में की चार पीठों की स्थापना
आदिगुरु शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में शंकराचार्य की चार पीठों की स्थापना की थी। इन चार पीठों पर चार शंकराचार्य भी नियुक्त किए गए। इसके लिए उन्होंने कुछ शास्त्रोक्त नियमों को बनाया था। आज भी शंकराचार्य के पद पर किसी संत की नियुक्ति करते समय इन नियमों का कुछ हद तक ख्याल रखा जाता है।
शंकराचार्य का पद धारण करने के लिये संन्यासी को सनातन संस्कृति का प्रकांड विद्वान होना चाहिये । संन्यासी को जितेंद्रीय होने के साथ उनके पास वैदिक में पीएचडी या आचार्य की डिग्री होना आवश्यक है । वेद, पुराण, उपनिषदों और शास्त्रोक्त ग्रंथों की विस्तृत जानकारी होना चाहिये । शंकराचार्य के पद पर पहुंचने के लिए कठोर कसौटियों पर से खरा उतरना होता है। कठिन तपस्या और त्याग को तो परखा ही जाता है साथ ही गहन शास्त्रार्थ से भी गुजरना होता है।
कठोर नियम है शंकराचार्य के पद के
शंकराचार्य का शास्त्रार्थ विभिन्न शास्त्रीय विधाओं में महारत रखने वाले 14 विद्वानों के समक्ष होता है । शास्त्रार्थ में निपुणता से ही शंकराचार्य पद का मार्ग प्रशस्त होता है ।ये 14 विद्वान व्याकरण, वेद, निरुक्त, छंद, साहित्य, न्यास, मीमांसा, योग, ब्रह्मसूत्र, उपनिषद, श्रीमद्भागवत जैसी विधाओं के प्रकांड पंडित होते हैं । शंकराचार्य परंपरा का मुख्य केंद्र काशी है जहां पर मान्यता है कि ढाई हजार वर्ष पूर्व आद्य शंकराचार्य और वेदव्यास के बीच 16 दिन तक शास्त्रार्थ हुआ था ।
ऋग्वेद में देवताओं की स्तुति की गई है और विश्व की शक्तियों की विस्तृत विवेचना की गई है । यजुर्वेद में कर्म का गुणगान किया गया है और श्रेष्ठतम कर्म का आदेश है । इसलिये इसको कर्मकांड का वेद कहा गया है ।सामवेद में पूजा और आराधना की जानकारी दी गई है इसलिये इसको उपासना काण्ड का वेद बताया गया है । अथर्ववेद में ज्ञान, कर्म और उपासना का मेल है इसलिये इसको ब्रह्मवेद की उपमा दी गई है ।
आद्य शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा और प्रसार के लिए देश की चार दिशाओं में चार पीठ की स्थापना की थी। चारों पीठों के प्रमुख शंकराचार्य होते हैं। मठान्मय ग्रंथ के अनुसार चारों पीठों की परंपराए इस प्रकार है।
शारदा मठ – द्वारका
दिशा – पश्चिम
पारंपरिक संप्रदाय – तीर्थ और आश्रम
वर्तमान में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती 79वें शंकराचार्य के रूप में गद्दी पर आसीन। दशनामी में वे सरस्वती संप्रदाय से हैं जबकि इस पीठ पर तीर्थ और आश्रम संप्रदाय के शंकराचार्य की परंपरा रही है।
ज्योतिर्मठ – बद्रिका
दिशा – उत्तर
पारंपरिक संप्रदाय – गिरि,पर्वत व सागर
वर्तमान में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती इस पीठ के शंकराचार्य है।
गोवर्धन मठ – पुरी
दिशा – पूर्व
पारंपरिक संप्रदाय – अरण्य
स्वामी निश्चलानंद सरस्वती इस पीठ के शंकराचार्य है। निश्चलानंदजी सरस्वती संप्रदाय से हैं।
श्रृंगेरी मठ – रामेश्वरम्
दिशा – दक्षिण
पारंपरिक संप्रदाय – सरस्वती, भारती व पुरी
वर्तमान में इस पीठ पर स्वामी भारतीकृष्ण 36वें शंकराचार्य हैं।

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