23 साल से भाजपा के कब्जे में है ये सीट, मुख्यमंत्री कमलनाथ की साख दांव पर

बैतूल। लंबे समय तक कांग्रेस का गढ़ रहे बैतूल संसदीय क्षेत्र में वर्ष 1996 में भाजपा ने ऐसी सेंध लगाई कि उसके बाद से लगातार सांसद की कुर्सी भाजपा के ही कब्जे में रही और कांग्रेस को हर बार करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है।
वर्ष 1996 में भाजपा ने बाहरी उम्मीदवार को टिकट न देते हुए जनता की मांग पर स्थानीय उम्मीदवार के रूप में विजय खंडेलवाल को मैदान में उतारा था। खंडेलवाल ने कांग्रेस के हाथ से बैतूल संसदीय सीट छीन ली और उसके बाद वर्ष 2004 तक हुए 3 चुनावों में भी जनता ने भाजपा को ही जिताया। विजय खंडेलवाल के निधन के बाद वर्ष 2008 में हुए उपचुनाव में भी भाजपा उम्मीदवार हेमंत खंडेलवाल ने जीत का सिलसिला बरकरार रखा।
परिसीमन के बाद अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए बैतूल संसदीय क्षेत्र के आरक्षित होने के बाद भी लगातार 2 चुनावों में भाजपा ने जीत हासिल की है। इस बार प्रदेश में कांग्रेस की सरकार के काबिज होने के बाद मुख्यमंत्री अपने पड़ोसी जिले की बैतूल संसदीय सीट को हर हाल में भाजपा के हाथों से छीनने के लिए कवायद कर रहे हैं।
विकास और रोजगार के मुद्दे हावी
बैतूल संसदीय क्षेत्र के गांवों में पहुंच मार्ग, पानी और ग्रामीण युवाओं को रोजगार का अभाव होना ही प्रमुख मुद्दे हैं। कांग्रेस इन मुद्दों को ही तेजी से हवा दे रही है और भाजपा के पास इनका कोई ठोस जवाब नहीं है। पिछले 10 वर्ष से सांसद ज्योति धुर्वे का जनता से सीधा संपर्क ही नहीं हो पाया, जिससे ग्रामीण विकास चुनिंदा नेताओं के इशारों पर ही होता रहा है। यही कारण है कि अधिकांश क्षेत्रों में सांसद के खिलाफ ग्रामीणों में बेहद नाराजगी बनी हुई है। इस नाराजगी को दूर करने के लिए भाजपा नेताओं को भरसक प्रयास करने होंगे अन्यथा जनता का गुस्सा भाजपा के गढ़ में आसानी से सेंध लगाने में कामयाब हो जाएगी। ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल का संकट भाजपा के 23 साल के संसदीय कार्यकाल में भी दूर नहीं हो पाया है। जनता को हर साल गर्मी के दिनों में नदी-नालों या फिर पोखरों के पानी से प्यास बुझाने मजबूर होना पड़ता है।
संसदीय क्षेत्र में तीन जिले की 8 विधानसभा सीटें हैं शामिल
आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित बैतूल- संसदीय क्षेत्र में वर्ष 2008 तक हरदा जिले के 2 विधानसभा क्षेत्र और बैतूल जिले के 6 विधानसभा क्षेत्र शामिल थे। परिसीमन के बाद बैतूल जिले की एक विधानसभा सीट के कम हो जाने के कारण इस संसदीय क्षेत्र में खंडवा जिले की हरसूद विधानसभा सीट को भी शामिल कर लिया गया है। वर्तमान में बैतूल संसदीय क्षेत्र में बैतूल, मुलताई, आमला, घोड़ाडोंगरी, भैंसदेही, हरदा, टिमरनी और हरसूद विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। बैतूल संसदीय क्षेत्र में वर्ष 1952 से लेकर वर्ष 2008 तक सर्वाधिक बार भाजपा का ही वर्चस्व कायम रहा है। अब तक हुए 15 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को यहां से मात्र 6 बार ही कामयाबी मिली है, जबकि 8 बार भाजपा और एक बार भारतीय लोक दल के प्रत्याशी को मतदाताओं ने जीत दिलाई है।
पिछले चुनाव में 3 लाख 28 हजार वोट से हारी कांग्रेस
बैतूल संसदीय क्षेत्र में वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 3 लाख 28 हजार 614 मतों से करारी पराजय का सामना करना पड़ा था। संसदीय क्षेत्र में कुल 16 लाख 7 हजार 831 मतदाता हैं। इनमें 8 लाख 36 हजार 846 पुरुष और 7 लाख 70 हजार 945 महिला मतदाताओं के अलावा 31 अन्य मतदाता शामिल हैं। वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी ज्योति धुर्वे को 6 लाख 43 हजार 651 मत मिले थे, जबकि निकटतम प्रतिद्वंदी कांग्रेस के उम्मीदवार अजय शाह को मात्र 3 लाख 15 हजार 37 मत ही मिले थे।
सीएम और पीएचई मंत्री की साख दांव पर
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिए बैतूल संसदीय क्षेत्र में जीत हासिल करना बड़ी चुनौती बन गया है। मुख्यमंत्री के पड़ोसी संसदीय क्षेत्र में 23 साल से भाजपा का कब्जा बना हुआ है, जिसे इस बार छीनने के लिए मुख्यमंत्री ने जिले के विधायक सुखदेव पांसे को पीएचई मंत्री बनाया है। प्रदेश के मुख्यमंत्री के पड़ोसी जिले और पीएचई मंत्री के गृह संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस को जीत दिलाने के लिए दोनों की ही प्रतिष्ठा दांव पर लग गई है।

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