22 साल बाद भारत आ रहा है कोई नया फाइटर प्लेन, इससे पहले 1997 में सुखोई आया था; राफेल के बारे में वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं

  • राफेल की पहली स्क्वाड्रन की तैनाती अंबाला एयरबेस पर, अगली स्क्वाड्रन बंगाल के हाशिमारा एयरबेस पर तैनात होगी
  • राफेल में हवा से हवा और हवा से जमीन में मार सकने वाली मिसाइलें भी तैनात हो सकती हैं, ऐसा विमान चीन-पाकिस्तान के पास भी नहीं

करीब 10 साल से वाद-विवादों, उतार-चढ़ावों से गुजरते हुए आखिरकार फ्रांस से राफेल फाइटर जेट भारत आने के लिए निकल ही पड़े। पिछले साल 8 अक्टूबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने फ्रांस जाकर राफेल की पूजा की थी। उस पूजा के ठीक 9 महीने और 21 दिन बाद राफेल हरियाणा के अंबाला एयरबेस पर तैनात हो जाएगा। भारत दैसो एविएशन से जो 36 राफेल फाइटर जेट खरीद रहा है, उसमें से अभी 5 ही मिले हैं, बाकि बचे 31 जेट 2022 तक मिलने की उम्मीद है।

यूपीए-2 के कार्यकाल में फ्रांस की दैसो एविएशन से भारत ने 126 राफेल खरीदने की डील की थी। बाद में 2015 में मोदी सरकार ने इस डील को कैंसिल कर दिया। सितंबर 2016 में 58 हजार 891 करोड़ रुपए की डील हुई, जिसमें 36 विमान खरीदने पर मंजूरी बनी। इस डील के 67 महीने बाद राफेल भारत को मिल रहे हैं।

1. राफेल डील की पुरानी कहानी क्या है?
सितंबर 2016 में भारत सरकार और फ्रांस की दैसो एविएशन के बीच राफेल फाइटर जेट को लेकर डील हुई। ये पूरी डील 58 हजार 891 करोड़ रुपए की है। इसमें 28 सिंगल-सीटर और 8 डबल-सीटर जेट खरीदे जा रहे हैं।

इस डील में ऑफसेट क्लॉज भी जोड़ा गया है, जिसकी वैल्यू 50% है। यानी, जितने की डील हुई है, उसकी 50% रकम कंपनी भारत में निवेश करेगी। राफेल डील की कीमत करीब 59 हजार करोड़ रुपए है, तो करीब 30 हजार करोड़ रुपए फ्रांस की कंपनियों की तरफ से भारत में ही आएगा।

इसी ऑफसेट क्लॉज की वजह से भारत में राफेल डील को लेकर जमकर विवाद भी हुआ था। कांग्रेस का आरोप था कि मोदी सरकार ने अनिल अंबानी की कंपनी को इस डील में ऑफसेट पार्टनर बना दिया, ताकि उन्हें फायदा हो। जबकि, सरकार की तरफ से कहा गया था कि ये कंपनी पर डिपेंड करता है कि वो किसे ऑफसेट पार्टनर चुन रही है।

2. फ्रांस के मोंट-डे-मार्सन एयरबेस पर ही हुई है भारतीय पायलट्स की ट्रेनिंग
राफेल उड़ाने के लिए भारतीय वायुसेना के पायलट्स की ट्रेनिंग फ्रांस के मोंट-डे-मार्सन एयरबेस पर हुई। यहीं पर मिराज 2000 की ट्रेनिंग भी हुई थी। न सिर्फ भारतीय वायुसेना के पायलट्स बल्कि इंजीनियरों और टेक्नीशियंस को भी ट्रेनिंग दी गई है। यही लोग भारत आकर दूसरे साथियों को ट्रेनिंग देंगे।

फ्रांस के एयरबेस पर भारतीय पायलट्स ने सिम्युलेटर में भी राफेल उड़ाकर देखे। सिम्युलेटर एक तरह की मशीन होती है, जिसका इस्तेमाल ट्रेनिंग के लिए किया जाता है।

17वीं स्क्वाड्रन गोल्डन एरोज राफेल की पहली स्क्वाड्रन होगी। खास बात ये है कि पूर्व एयर चीफ बीएस धनोआ ने कारगिल युद्ध के दौरान इस स्क्वाड्रन की कमान संभाली थी। विदेशों से ट्रेनिंग लेकर आए पायलट इस स्क्वाड्रन में तैनात होंगे। एक साल बाद जब हाशिमारा में राफेल की दूसरी स्क्वाड्रन तैयार होगी, तब वहां पायलट का ग्रुप बंट जाएगा।

3. 7 हजार किमी की दूरी तय कर फ्रांस से भारत पहुंचेगा राफेल
27 जुलाई की सुबह फ्रांस के मेरिनेक एयरबेस से 5 राफेल फाइटर जेट ने उड़ान भरी। ये विमान 29 जुलाई को हरियाणा के अंबाला एयरबेस पर उतरेंगे। मेरिनेक एयरबेस से अंबाला एयरबेस के बीच 7 हजार किमी की दूरी है। फ्रांस से भारत आने में सिर्फ एक ही स्टॉप लिया। पायलट्स को आराम देने के लिए इसे यूएई के अल-दफरा एयरबेस पर रोका गया। उसके बाद वहां से सीधे अंबाला एयरबेस पर उतरेगा।

पहले लेग में फ्रांस की वायुसेना ने हवा में रीफ्यूलिंग की। लेकिन, उसके बाद भारतीय वायुसेना का आईएल-78 एयर रिफ्यूलर हवा में ही राफेल में फ्यूल भरेगा।

4. राफेल की तैनाती के लिए अंबाला एयरबेस ही क्यों?
राफेल की पहली स्क्वाड्रन को अंबाला एयरबेस पर तैनात किया जा रहा है। इसको यहां तैनात करने के पीछे भी एक खास वजह है और वो ये कि यहां से चीन-पाकिस्तान की सीमा बस 200 किमी दूर है।

अंबाला एयरबेस भारत की पश्चिमी सीमा से 200 किमी दूर है और पाकिस्तान के सरगोधा एयरबेस के नजदीक भी। यहां पर तैनाती से पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान के खिलाफ तेजी से एक्शन लिया जा सकेगा। न सिर्फ पाकिस्तान, बल्कि चीन की सीमा से भी इसकी दूरी 200 किमी है। अंबाला एयरबेस से 300 किमी दूर लेह के सामने चीन का गर गुंसा एयरबेस है।

शुरुआत में जगुआर और मिग-21 बाइसन जैसे फाइटर जेट को भी अंबाला एयरबेस पर ही तैनात किया गया था। इसके बाद राफेल की जो अगली स्क्वाड्रन आएगी, उसे पश्चिम बंगाल में मौजूद हाशिमारा एयरबेस पर तैनात किया जाएगा।

5. राफेल की 3 अहम खासियतें क्या हैं?
1. डिजाइन और इंजन: कम्प्यूटर सिस्टम, जो पायलट को कमांड और कंट्रोल करने में मदद करे

राफेल को राडार क्रॉस-सेक्शन और इन्फ्रा-रेड सिग्नेचर के साथ डिजाइन किया गया है। इसमें ग्लास कॉकपिट है। इसके साथ ही एक कम्प्यूटर सिस्टम भी है, जो पायलट को कमांड और कंट्रोल करने में मदद करता है। इसमें ताकतवर एम 88 इंजन लगा हुआ है। राफेल में एक एडवांस्ड एवियोनिक्स सूट भी है।

राफेल डीएच (टू-सीटर) और राफेल ईएच (सिंगल सीटर), दोनों ही ट्विन इंजन, डेल्टा-विंग, सेमी स्टील्थ कैपेबिलिटी के साथ चौथी जनरेशन का विमान है। इससे परमाणु हमला भी किया जा सकता है।

2. राडार सिस्टम : 100 किमी के दायरे में भी टारगेट को डिटेक्ट कर सकता है
इस जेट में आरबीई 2 एए एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (AESA) राडार लगा है, जो लो-ऑब्जर्वेशन टारगेट को पहचानने में मदद करता है। इसमें सिंथेटिक अपरचर राडार (SAR) भी है, जो आसानी से जाम नहीं हो सकता। जबकि, इसमें लगा स्पेक्ट्रा लंबी दूरी के टारगेट को भी पहचान सकता है।
इन सबके अलावा किसी भी खतरे की आशंका की स्थिति में इसमें लगा राडार वॉर्निंग रिसीवर, लेजर वॉर्निंग और मिसाइल एप्रोच वॉर्निंग अलर्ट हो जाता है और राडार को जाम करने से बचाता है। इसके अलावा राफेल का राडार सिस्टम 100 किमी के दायरे में भी टारगेट को डिटेक्ट कर लेता है।

3. हथियार : न सिर्फ हवा से जमीन, बल्कि हवा से हवा में भी मारने की ताकत
राफेल में आधुनिक हथियार भी हैं। जैसे- इसमें 125 राउंड के साथ 30 एमएम की कैनन है। ये एक बार में साढ़े 9 हजार किलो का सामान ले जा सकता है। इसमें हवा से हवा में मारने वाली मैजिक-II, एमबीडीए मीका आईआर या ईएम और एमबीडीए मीटियर जैसी मिसाइलें हैं। ये मिसाइलें हवा में 150 किमी तक के टारगेट को मार सकती हैं।
इसमें हवा से जमीन में मारने की भी ताकत है। इसकी रेंज 560 किमी है। इस एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल इराक, अफगानिस्तान, लीबिया, माली और सीरिया में हो चुका है। इस फाइटर जेट के आने से भारत की ताकत हिंद महासागर में भी बढ़ेगी।

6. पाकिस्तान तो क्या, चीन के पास भी राफेल के टक्कर का कोई फाइटर जेट नहीं
राफेल जैसा फाइटर जेट चीन और पाकिस्तान दोनों के पास ही नहीं है। चीन के पास चेंगड़ू जे-10 विमान है, जो अमेरिका के एफ-16 ए/बी के बराबर ही है। चीन के पास ऐसे 400 विमान हैं। इसमें 100 किमी तक की रेंज में मारने वाली मिसाइलें हैं। चीन के पास शेन्यांग जे-11 भी है, जो सुखोई-27 की कॉपी है। ये भारत के पास मौजूद सुखोई-30एमकेआई की तरह है।

इसके अलावा चीन ने एक शेन्यांग जे-16 फाइटर जेट भी बनाया है, जिसमें 150 किमी तक की मारक क्षमता वाली मिसाइलें तैनात हो सकती हैं। चीन के पास सुखोई-30एमकेके भी है, जो भारतीय वायुसेना के पास मौजूद सुखोई-30एमकेआई की तरह है। चीन के पास सुखोई-30 भी है। इन सबके अलावा चीन के पास 5वीं पीढ़ी का जे-20 फाइटर जेट भी है। लेकिन, ये अभी ऑपरेशनल नहीं है।

वहीं, पाकिस्तान के पास सबसे अच्छा फाइटर जेट एफ-16 ब्लॉक 52 है, जिसकी मिसाइल की मारक क्षमता 120 किमी तक की है। कुल मिलाकर पाकिस्तान और चीन की तुलना में भारतीय वायुसेना के पास अच्छे फाइटर जेट हैं।

जबकि, भारतीय वायुसेना के पास राफेल, सुखोई 30एमकेआई, मिराज 2000 और मिग 29 का एक शानदार कॉम्बिनेशन है। इसके अलावा जगुआर, मिग 21 बाइसन और स्वदेश एलसीए एमके1 भी है। भारत को जो राफेल मिला है, उसका मुकाबला करने के लिए चीन के पास कोई लड़ाकू विमान नहीं है।

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