क्या दिग्विजय भोपाल में लहलहा पाएंगे कांग्रेस के लिए वोटों की फसल?

भोपाल। 35 साल। जी हां…पूरे 35 साल हो गए हैं, भोपाल से किसी कांग्रेस उम्मीदवार को लोकसभा चुनाव में विजयी हुए। लोकसभा चुनाव में जीत किस चिड़िया का नाम है, यह भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन की सीढ़ी चढ़कर, बारास्ते युवक कांग्रेस की गलियों से गुजरकर कांग्रेस संगठन की दहलीज पर पहुंचे भोपाल के कई नेता तो जानते तक नहीं होंगे। इस चुनाव में कांग्रेस के नजरिए से दिग्विजय सिंह संभावना की किरण के रूप में हैं, लेकिन तीन दशकों का सूखा मिटाकर वे कांग्रेस के लिए लगभग बंजर हो चुकी भोपाल संसदीय सीट की जमीन पर वोटों की फसल लहलहा पाते हैं या नहीं, यह देखना दिलचस्प होगा।
एक दशक तक मप्र के मुख्यमंत्री और दो बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के नाते दिग्विजय को प्रदेश के मुद्दों की गहरी समझ भी है और पकड़ भी। नेताओं के मिजाज की स्कैनिंग वे बखूबी कर लेते हैं। विवाद उन्हें ताकत देते हैं। खासतौर पर आरएसएस, हिंदुत्व और भाजपा को लेकर उनके आग उगलते ट्वीट्स को लेकर सोशल मीडिया पर जितनी तोहमत उन्होंने झेली शायद ही किसी दूसरे नेता ने झेली हो। उन्हें भोपाल से चुनाव लड़ाने का फैसला मुख्यमंत्री कमलनाथ ने काफी सोच विचार कर लिया था।
मप्र के तमाम नेताओं पर नजरें दौड़ाएं तो दिग्विजय और ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा ऐसा कोई तीसरा नेता नजर नहीं आता, जिसकी पूरे प्रदेश में समान रूप से पकड़ हो। सिंह को भोपाल से चुनाव लड़ाने की वजह उनकी सर्वस्वीकार्य छवि रही है। पार्टी जानती थी कि राष्ट्रीय स्तर के कद को देखते हुए कोई कांग्रेसी नेता या गुट उनका विरोध नहीं करेगा। भितरघात जैसे खतरों से उन्हें दो-चार नहीं होना पड़ेगा, लेकिन पार्टी को यह आभास नहीं था कि साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को मैदान में उतारकर भाजपा भोपाल के चुनावी समर की दिशा ही मोड़ देगी। भाजपा की सोच यह थी कि प्रज्ञा को सामने देखते ही दिग्विजय
सिंह अपना संतुलन खो देंगे और कुछ न कुछ ऐसा बोल जाएंगे, जिससे वोटों का ध्रुवीकरण हो जाए और फायदा भाजपा ले भागे। पर चतुर सुजान दिग्विजय भाजपा के इस मंसूबे को ताड़ गए। उन्होंने साध्वी के मैदान में आते ही विवाद वाले विषयों के लिए चुप्पी साध ली। कार्यकर्ताओं को भी कह दिया कि भगवा आतंकवाद, हिंदुत्व जैसे विषयों को न छुएं।
बदल रही राजनीतिक फिजा
जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे राजनीतिक फिजा बदल रही है। भाजपा उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा ठाकुर इस चुनाव पर हिंदुत्व का रंग उड़ेल रही हैं। इसकी झलक मंगलवार को उनके नामांकन फॉर्म जमा कराने के लिए निकली रैली में भी देखने को मिली। पूरी रैली भगवा रंग से सराबोर दिखी। भगवा ध्वज और भगवा साफा पहने लोगों का हुजूम साफ संकेत दे रहा था कि भोपाल का चुनाव किस दिशा में जा चुका है। एक संन्यासिन के नाते चुनाव के लिए भिक्षा मांगकर वे लोगों से धार्मिक आधार पर भी कनेक्ट हो रही हैं। ऐसे में दिग्विजय के लिए यह कठिन चुनौती होगी कि वे इस चुनाव को अपने एजेंडे पर कैसे लाते है।
अब साध्वी नपे-तुले शब्दों में कर रहीं बात
दिग्विजय भाजपा के दांव में नहीं आए, अलबत्ता साध्वी सेल्फ गोल कर बैठीं। मुंबई आतंकवादी हमले में शहीद हुए महाराष्ट्र एटीएस के अफसर हेमंत करकरे के बारे में दिए उनके बयान ने पूरे देश में भूचाल ला दिया। भाजपा को जब लगा कि वह बेवजह कठघरे में आ रही है, जिसका खामियाजा महाराष्ट्र समेत दूसरी सीटों पर भी भुगतना पड़ सकता है, तब उसने साध्वी के बयान से पल्ला झाड़ लिया। बाद में साध्वी की काउंसलिंग की गई। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान से लेकर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा ने उन्हें ट्रेनिंग दी कि उन्हें क्या-क्या बोलना है और किस-किस बात पर चुप रहना है। अब साध्वी मीडिया से नपे-तुले शब्दों में बात कर रही हैं। भाषण देते समय भी तोल-मोल के बोल रही हैं।
इससे उलट दिग्विजय इस चुनाव को विकास के मुद्दे पर लड़ना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने भोपाल के लिए एक विजन डॉक्यूमेंट जारी किया है। भाजपा विजन डॉक्यूमेंट पर दिग्विजय की खिल्ली उड़ाने से पीछे नहीं हट रही है। पिछले 15 साल से प्रदेश में जिस एक मुद्दे को भाजपा ने जिंदा रखा है, वह है दिग्विजय शासन के दस साल। भाजपा ने तो विकास को लेकर उनका नामकरण मिस्टर बंटाधार कर रखा है। पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा का कहना है कि जिस व्यक्ति ने दस साल तक प्रदेश को विकास के नाम पर अंधेरे गड्ढे दिए, जिसने प्रदेश का बंटाढार किया, वह विजन डॉक्यूमेंट के नाम पर जनता को दिग्भ्रमित करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता।

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