आगरा से छत्तीसगढ़ तक का सफर, सिर पर बोझ हाथ में बच्चे, मजबूर हुए मजदूर

आगरा से लौट रहे 32 मजदूरों को मड़िया के पास कराया भोजन

टीकमगढ़. महानगरों में काम करने वाले मजदूर अभी भी मजबूर है। झांसी की ओर से आ रहे मजदूर आगरा से छत्तीसगढ़ तक का सफर कर रहे हैं। सात दिनों से लगातार पैदल चल रहे मजदूरों काे दो दिन बाद भोजन मिला है। मजदूरों का कहना है अब गांव की राह दिख रही है कि कब हम अपने गांव पहुंचे सके।

सोमवार को झांसी की ओर से 32 मजदूरों का जत्था पृथ्वीपुर होते हुए टीकमगढ़ की ओर रवाना हुआ। महिलाएं सिर पर गृहस्थी का सामान और पुरूष गोद में छोटे-छोटे बच्चों को लेकर चल रहे थे। उनके मन में सिर्फ एक ही उम्मीद है कि जल्द से जल्द हम अपने गांव पहुंचे। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ निवासी सनत साहू ने बताया कि 13 मई को आगरा से निकले थे। सात दिन से पैदल चल रहे हैं। रात होने पर सही स्थान देखकर नींद पूरी कर लेते थे। बच्चों को भी घर जाने की ललक है। साधन नहीं होने से पैदल ही चल पड़े। मजदूरों के जत्थे में 10 बच्चे भी शामिल है। जिनमें तीन बच्चों को गोद में लेकर चलना पड़ता है। काेई 6 माह का है तो कोई बच्चा एक साल है। कभी महिलाएं बच्चे को लेकर चलती है तो कभी पुरूष बच्चे को गोद ले लेते है और महिलाएं सिर पर गृहस्थी का बोझ लेकर पैदल चल रही है। 

दो दिन बाद पृथ्वीपुर में मिला भोजन
झांसी की ओर से पैदल आ रहे मजदूरों को कहीं पर भी भोजन पानी की व्यवस्था नहीं हुई। जैसे ही वे मड़िया के पास पहुंचे तो वहां प्रशासन की ओर रूकने और भोजन की व्यवस्था कराई गई। सचिव जगदीश विश्वकर्मा ने बताया कि मजदूरों को नाश्ता कराया। इसके बाद सभी को भोजन के पैकेट दिए गए। पैदल जा रहे सभी मजदूरों को निवाड़ी की सीमा तक छोड़ा जाएगा।

लॉकडाउन खत्म होने का करते रहे इंतजार, सब्र टूटा तो पैदल ही चल दिया
बलराम साहू ने बताया कि आगरा में रहकर बिल्डिंग निर्माण का काम करते थे। लॉक के चलते काम बंद हुआ तो डेढ़ माह तक खत्म होने का इंतजार करते रहे। इस बीच कई परेशानियों से गुजरना पड़ा। वहां पर बच्चों के दूध तक के लिए परेशान हो जाते थे, यूपी सरकार ने राशन पानी की बिल्कुल भी व्यवस्था नहीं हुई। छोपड़ी में रहने के दौरान कुछ लोग बच्चों को देखकर आटा चावल दे जाते थे, लेकिन जब इंतजार का सब्र टूटा तो पैदल ही गांव तक जाने का मन बना लिया।

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