लॉकडाउन के बाद बदल जाएगा स्कूल और कॉलेजों का नजारा, करना होगा इन नियमों का पालन

नई दिल्ली: कोरोनावायरस महामारी के चलते दुनियाभर में सोशल डिस्टेंसिंग का सख्ती से पालन किया जा रहा है. लोग एक दूसरे से व्यक्तिगत रूप से मिलने के बजाए इंटरनेट या फोन के जरिए ही बात कर रहे हैं. पढ़ाई भी ऑनलाइन की जा रही है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि सोशल डिस्टेंसिंग के नियम का पालन स्कूलों में भी किया जाएगा.
मानव संसधान विकास मंत्रालय के अधिकारियों ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया है कि स्कूलों के लिए नई गाइडलाइन्स तैयार की जा रही हैं. लॉकडाउन के बाद जब स्कूल खुलेंगे तो स्कूलों में इन गाइडलान्स का पालन किया जाएगा. पीटीआई ने अधिकारियों के हवाले से कहा है कि स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग द्वारा गाइडलाइन्स बनाई जा रही हैं. मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने पिछले सप्ताह राज्य के शिक्षा मंत्रियों के साथ हुई बैठक में सुरक्षा दिशानिर्देशों के मुद्दे पर विचार-विमर्श किया था.
अधिकारियों ने कहा कि स्टूडेंट्स के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए स्कूलों में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जाएगा. यानी लॉकडाउन के बाद जब भी स्कूल और कॉलेज खोले जाएंगे तो सोशल डिस्टेंसिंग का पूरी तरह से पालन किया जाएगा. मंत्रालय क्लास में स्टूडेंट्स के बैठने की व्यवस्था और सुरक्षा को लेकर गाइडलाइन्स जल्द जारी कर सकता है, जो सोशल डिस्टेंसिंग के लिए बेहद अहम हैं.
मौजूदा समय में स्कूलों में एक क्लास रूम में 30 से 40 स्टूडेंट्स के बैठने की व्यवस्था की जाती है. ज्यादातर स्कूलों में स्टूडेंट्स सीट या टेबल एक दूसरे के साथ शेयर करते हैं. कुछ स्कूलों में दो से तीन बच्चे भी टेबल डेस्क शेयर कर लेते हैं.
लेकिन लॉकडाउन के बाद अगर स्कूलों में सामाजिक दूरी बनाई जाती है, तो MHRD को प्रत्येक स्कूल की जगह पर भी ध्यान देना होगा. हालांकि, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करके स्कूलों के लिए उसी तरह कक्षाएं संचालित करना मुश्किल हो सकता है जैसे वे लॉकडाउन से पहले आयोजित की जा रही थीं.
एक वरिष्ठ अधिकारी ने पीटीआई को बताया, “गाइडलाइन्स में एक चेकलिस्ट और स्टूडेंट्स और स्टाफ की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए उपाय शामिल होंगे. क्षेत्रों में कोरोनावायरस की स्थिति को भी ध्यान में रखा जाएगा. संस्थान हालातों के अनुसार गाइडलाइन्स को अपने हिसाब से फॉलो कर सकेंगे. मानव संसाधन विकास मंत्री ने कई बार दोहराया है कि छात्रों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.”
अधिकारी ने आगे बताया कि गाइडलाइन्स बनाई जा रही है और राज्यों के साथ जल्द ही शेयर की जाएंगी, ताकि स्कूल और कॉलेज फिर से खुलने से पहले उसकी तैयारी की जा सके.
वहीं, यूजीसी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों के लिए गाइडलाइन्स पहले ही जारी कर चुकी है, जिसमें बताया गया है कि पुराने स्‍टूडेंट्स के लिए क्लासेस अगस्त से शुरू होंगी और नए स्टूडेंट्स के लिए क्लासेस सितंबर के महीने से शुरू होंगी. यूजीसी की गाइडलाइन्स में क्लासेस संचालित करने के लिए ऑनलाइन टीचिंग पर भी जोर दिया गया है.

बड़े परिवर्तन के लिए रहें तैयार

कोरोना वायरस के संक्रमण के प्रसार की रोकथाम करने के उद्देश्य से भारत में मार्च के चौथे सप्ताह से चल रहा लॉकडाउन अभी तक की घोषणा के मुताबिक तीन मई को खत्म होगा. चार मई और उसके बाद आनेवाले दिनों में चीजें पहले जैसी नहीं रह जायेंगी. आगामी जून महीने में स्कूलों को खोले जाने का प्रस्ताव है, लेकिन अभिभावक अपने बच्चों को नहीं भेजेंगे, क्योंकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि स्कूलों में आगे अब क्या होगा. हम ऐसे देश नहीं हैं, जहां आभासी कक्षाओं (वर्चुअल क्लासरूम) का चलन हो. यहां स्कूलों में साथ-साथ खेलने और मिलने-जुलने का चलन विशेष तौर पर स्कूली अनुभव में शामिल होता है.

डेनमार्क ने कुछ दिन पहले अपने स्कूल खोल दिये. वहां डेस्क पर बच्चों को छह फीट की दूरी पर बैठाया जा रहा है. ऐसा कर पाना भारत के अधिकतर स्कूलों में संभव ही नहीं है. यहां कक्षाओं में बैठने की समुचित व्यवस्था तक नहीं होती है. डैनिस बच्चों को खेलने से मना किया गया है, लेकिन बिना निगरानी के बच्चों को रोक पाना क्या संभव हो पायेगा? बच्चे तो बच्चे होते हैं, एक-दूसरे को देखकर उत्साहित होंगे और खेलने के लिए तत्पर होंगे. कितने अभिभावक अपने बच्चों के जीवन के साथ जोखिम मोल लेंगे? क्या इस बात की कोई गारंटी है कि स्कूल में बच्चे संक्रमित नहीं होंगे? मैं नहीं सोचता कि संख्या असंवेदनशील होगी. अगर कोई बच्चा संक्रमित हो जाता है, जिसकी पूरी आशंका है, तो क्या स्कूल स्थायी रूप से बंद हो जायेगा या अच्छा होने की उम्मीद में पूर्ववत चलता रहेगा? इन समस्याओं का कोई ठोस जवाब किसी के पास नहीं है. केवल हम यह कोशिश कर सकते हैं कि हमें क्या करना चाहिए और कैसे परिस्थितियां सामान्य हो सकें. डैनिस सरकार ने इस मामले में साहसपूर्ण फैसला किया है और आगे बढ़कर काम कर रही है.

लॉकडाउन हटाने के बाद जब लोग वापस लौटेंगे, तो कार्यस्थलों पर कामकाज का तरीका भी बदल जायेगा. आमतौर पर कंपनियों के मानव संसाधन विभागों को तीन मई के बाद उत्पन्न होनेवाले हालातों से निपटने का कोई अनुभव नहीं है. उदाहरण के तौर, क्या कर्मचारियों के काम पर जाने की व्यवस्था की जायेगी. कंपनी के ड्राइवर को इजाजत मिलेगी. अगर कर्मचारियों को लाते समय ड्राइवर संक्रमित हो जाता है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? ऐसे में कार्यस्थलों पर भी संरचनागत सुधार करते हुए बड़ा बदलाव करने की आवश्यकता होगी. हालांकि ज्यादातर कंपनियों के पास ऐसा कर पाने की क्षमता नहीं है. दशकों से प्रतिष्ठानों के कार्यालयों और सम्मेलन कक्षों को अधिकतम लोगों के शामिल होने के लिए तैयार किया गया है, न कि परस्पर होनेवाले संक्रमण से बचाव के लिए. कामगारों की सुरक्षा के मद्देनजर वे अपने काम को कैसे शुरू कर पायेंगे?

एक बार फिर ये कठिन सवाल हैं, जिसका कोई जवाब नहीं है, क्योंकि पहले किसी को इसका जवाब देने की जरूरत ही नहीं पड़ी थी. कार्यस्थलों और कार्यालयों में कोई एकरूपता जैसी स्थिति नहीं है, इसलिए प्रत्येक कंपनी और हर एक संस्थान अपने मुताबिक नियम और कायदे बनाते रहे हैं. इसमें से कई ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं है. वास्तविक विशेषज्ञता की जरूरत कानूनी दायित्व, सुरक्षा और बीमारियों की रोकथाम के क्षेत्र में है. मानव संसाधन विभाग के पास ऐसे मामलों में कोई अनुभव नहीं है और न ही किसी अन्य विभाग के पास है.

मशहूर लेखक सलमान रुश्दी ने एक बार कहा था कि भारत लोगों की भीड़ है. यहां तक कि अगर यह मजाक में कहा गया है, तो भी यह कहना एक हद तक सही है. बड़े स्तर पर भीड़-भाड़ हमारे जीवन का हिस्सा है, धार्मिक स्थानों से लेकर राजनीतिक रैलियों तक और यहां तक कि रोजाना के बाजार तक हर जगह भीड़ ही भीड़ है. इन सब के साथ चार मई के बाद क्या होगा, जब हम जैसा जीवन हम जी रहे हैं, उससे एक समाज के तौर पर अचानक हमें छूट दे दी जायेगी? ऐसे तमाम सवाल दिमाग में कौंधते हैं. और, तमाम तरह की आशंकाएं भी हैं. दुनिया के सबसे असंतुलित समाज में क्या यह बीमारी अधिक समानता या नुकसान की शुरुआत करेगी?

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