50 साल लंबे सियासी सफर में सबसे कठिन सीट पर दांव

भोपाल। दिग्विजय सिंह ने जब अपने जीवन का पहला चुनाव जीता था, तब उनकी उम्र थी महज 23 साल। चुनाव था राघौगढ़ नगरपालिका का, जिसमें वे अध्यक्ष चुने गए थे। राघौगढ़, दिग्विजय का होम पिच है। यहां से वे विधायक चुनकर मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक बने। लगभग 50 साल बाद यानी 72 साल की उम्र में दिग्विजय एक बार फिर चुनावी समर में हैं। यह समर है भोपाल संसदीय सीट का, जो उनके अब तक के सभी चुनावों के मुकाबले सबसे कठिन साबित हो सकता है। नया क्षेत्र, नया मतदाता, नए किस्म का सियासी मिजाज। पिछले तीन दशक से भाजपा को मिल रही लगातार जीत ने कांग्रेस की सूची में भोपाल का नाम लाल अक्षरों में डेंजर जोन वाली सीटों में दर्ज करा दिया है।
दिग्विजय सिंह जैसे बड़े कद के नेता को भोपाल से उतारने का मकसद सूची में भोपाल को डेंजर जोन से सेफ जोन में लाना है। कार्यकर्ताओं में उत्साह भरते सिंह टिकट मिलने के बाद से कह रहे हैं कि भाजपा चाहे जिसे टिकट दे दे, उनकी जीत तय है। गौरतलब है कि सिंह के नाम के एलान होने के दस दिन बाद तक भाजपा उनके मुकाबले उम्मीदवार का नाम तय नहीं कर पाई। उनके समर्थक इसे दिग्विजय का खौफ बताते हैं।
सोचा जा सकता है कि जिस सीट से पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा जैसे शख्स कांग्रेस की टिकट पर चुनाव जीते हों, वहां कांग्रेस तीस साल से एक जीत के लिए तरस रही है। कांग्रेस ने यहां सारे नुस्खे आजमा लिए। ब्राह्मण, मुस्लिम, कायस्थ, ओबीसी, नवाब, क्रिकेटर, स्थानीय, बाहरी सबको आजमा लिया, पर कामयाबी नसीब नहीं हो पाई। कांग्रेस के केएन प्रधान 1984 में भोपाल से जीतने वाले आखिरी उम्मीदवार थे। हारने वालों की सूची में पूर्व क्रिकेटर नवाब पटौदी, पूर्व मंत्री सुरेश पचौरी जैसे दिग्गज शामिल हैं।
अचानक नहीं आया दिग्विजय का नाम
सूत्रों की मानें तो मुख्यमंत्री कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच काफी पहले तय हो गया था कि सिंह भोपाल से चुनाव लड़ेंगे। यही वजह रही कि विधानसभा चुनाव में समन्वय समिति के अध्यक्ष रहे दिग्विजय सिंह को लोकसभा चुनाव के लिए बनी समन्वय समिति से हटा दिया गया। बाद में नाथ ने उन्हें भोपाल जैसी कठिन सीट से चुनाव मैदान में उतरने की सलाह दी और एक रणनीति के तहत चुनाव समिति की मुहर लगने से पहले मीडिया के सामने उनका नाम भोपाल सीट से घोषित कर दिया। पूरे 15 साल बाद किसी चुनाव का सामना कर रहे दिग्विजय सिंह गोवा विधानसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस में मुख्यधारा की राजनीति से अलग-थलग थे।
कांग्रेस में उनके पास कोई काम नहीं था। लिहाजा उन्होंने धार्मिक पुण्य कमाने की गरज से नर्मदा परिक्रमा लगाने की ठान ली। 71 साल की उम्र में 3700 किमी लंबी नर्मदा परिक्रमा से उन्होंने पुण्य तो कमाया ही, साथ-साथ अपने राजनीतिक कॅरियर को भी चमकाया। किस्मत और मेहरबान हुई और उनके हमदर्द कमलनाथ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनकर भोपाल आ गए। इसके बाद सिंह किंगमेकर की भूमिका में कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाने में जुट गए। तब से अब तक दिग्विजय मप्र की सियासत में अहम रोल निभा रहे हैं।
वोटों का गणित
भोपाल में मतदाताओं की संख्या करीब 16 लाख है। एक अनुमान के मुताबिक इनमें मुस्लिम मतदाताओं की तादाद साढ़े तीन लाख के आसपास है। आठ विधानसभाओं में से दो सीटें मुस्लिम बहुल हैं। 30 साल तक भोपाल सीट पर भाजपा के काबिज रहने की एक वजह वोटों का ध्रुवीकरण भी है। इस ध्रुवीकरण को इस बार भी दिग्विजय सिंह के खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा, इसमें किसी को शक नहीं है। कांग्रेस का गणित यह है कि दिग्विजय को आठ में से चार सीटों पर निर्णायक बढ़त मिलेगी और वे चुनाव निकाल ले जाएंगे। ये सीटें हैं भोपाल उत्तर, भोपाल मध्य, बैरसिया और सीहोर। दक्षिण पश्चिम सीट पर मामला बराबरी का हो सकता है जबकि गोविंदपुरा, हुजूर और नरेला में भाजपा को बढ़त मिल सकती है। विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच लगभग 67 हजार वोटों का फासला था। दिग्विजय इस फासले को किस तरह पाटते हैं यह देखना दिलचस्प होगा।
क्या हिंदुत्व होगा मुद्दा?
देश में हजारों नेता हैं जिनको संभव है कि उत्तर से दक्षिण तक और पूर्व से पश्चिम तक सारे लोग नहीं जानते हों, लेकिन दिग्विजय सिंह सोशल मीडिया में अपनी विवादित मौजूदगी के चलते पूरे देश में जाने जाते हैं। चुनावी रंग के शबाब पर आने में वक्त लगेगा, लेकिन हिंदुत्व का कार्ड मैदान पकड़ने लगा है। उनके समर्थक मंत्री आरिफ अकील ने दिग्विजय सिंह को सबसे बड़ा हिंदूवादी चेहरा बताकर इस मुहिम कोसबसे पहले हवा दी। खुद दिग्विजय नेअपने नाम का एलान होने के बाद सबसे पहला काम किया अपने गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और जैन संत आचार्य विद्यासागर से आशीर्वाद लेने का। इसके बाद उन्होंने भोपाल पहुंचकर मंदिरों में मत्था टेका।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर सिंह शुरू से हमलावर रहे है। पिछल हफ्ते उन्होंने कहा कि संघ स्वयं को हिंदू हितैषी सांस्कृतिक संगठन बताता है। मैं हिंदू हूं तो मुझसे बैर क्यों? राजनीतिक प्रेक्षकों की मानें तो जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ेगा वैसे-वैसे हिंदुत्व का मुद्दा जोर पकड़ेगा। तैयारी तो यह भी थी कि दिग्विजय के मुकाबले भाजपा किसी भगवाधारी को मैदान में उतारे। चर्चा में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और उमा भारती के नाम तैर रहे थे । उमा भारती खुद इस बार चुनाव लड़ने से इंकार कर चुकी हैं। जबकि प्रज्ञा ठाकुर चुनाव लड़ने की इच्छुक बताई जा रही थी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सक्रिय
दिग्विजय के चुनाव मैदान में उतरते ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सक्रिय हो गया है। संघ के दिग्गज भय्याजी जोशी पिछले मंगलवार को भोपाल में थे। उन्होंने भाजपा और संघ के पदाधिकारियों से कहा है कि भोपाल सीट को गंभीरता से लें। यही वजह है कि उम्मीदवार चयन को लेकर भी भाजपा जरूरत से ज्यादा गंभीर हो गई है।

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