मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने खड़ा है चुनौतियों का पहाड़

भोपाल. देश के बाकी राज्यों में इन दिनों सबसे बड़ी समस्या है सिर्फ कोरोना और उसके कारण उपजे हालात. लेकिन, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए बाकी राज्यों की तुलना में चुनौतियों का पहाड़ सामने खड़ा है. इंदौर, भोपाल, उज्जैन, खरगौन, देवास सहित कई जिले एक तरफ तो कोरोना संक्रमण में सरकार के लिए बड़ी चिंता का विषय बने हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ राजनैतिक अस्थिरता के माहौल में बनी सरकार को मजबूत बनाए रखना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है. सरकार को बहुत जल्द इंदौर और भोपाल जैसे बड़े जिलों में कोरोना को काबू में करना है.
इसके अलावा, किसानों की फसल खरीदी भी इस भाव में करना है कि किसान नाराज़ न हों. साथ ही, लॉकडाउन खुलने के साथ ही अपने मिनी कैबिनेट को मेगा कैबिनेट में बदलना है. क्यूंकि, हाल ही में कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए नए सहयोगियों का दवाब है. इसके साथ-साथ एमपी में निकट भविष्य में होने वाले 24 सीटों के उपचुनाव के लिए ऐसा स्कैच सरकार को तैयार करना है, जिसमें जनता भाजपा के पसंद का रंग भर सके. और ये सब कुछ बहुत कम समय में करना है. ज़ाहिर है कि ये इतना आसान काम नहीं है, यही वज़ह है कि शिवराज अपने विश्वसनीय सहयोगियों के साथ दिन-रात एक कर रहे हैं. सरकार की असल चुनौती तो तब शुरू होगी, जब लॉकडाउन खत्म होगा.
शिवराज की परेशानी में पैदा हुए बल
इन पंक्तियों के लिखे जाने तक एमपी में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 2100 पार कर चुकी है, जबकि 100 से ज्यादा मौतें भी हो चुकी हैं. 1200 से ज्यादा संक्रमित मरीजों और 60 से अधिक मौतों के साथ सूबे का इंदौर जिला शिवराज की परेशानी में बल पैदा कर रहा है. सख्ती से लेकर अनुरोध और अनुनय विनय तक सरकार के सारे प्रयास अभी तक तो कोई कारगर नहीं हुए हैं. आए दिन यहां मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है. विपक्ष इसे चायना के वुहान शहर के तौर पर स्थापित करने में लगा है. सबसे पहले सरकार को एमपी के इंदौर, उज्जैन और भोपाल को काबू में करना होगा, जो बहुत आसान नहीं दिखता.
सिंधिया का यह दबाव शिवराज को कर न दे परेशान
इंदौर और भोपाल के बेक़ाबू होने की वज़ह भी यही है कि जिस वक़्त कोरोना एमपी में दाख़िल हो रहा था, उस वक़्त सरकार का संधिकाल चल रहा था. तत्कालीन सरकार जाने वाली थी और नई सरकार आने वाली थी. ज़ाहिर था कि ऐसे माहौल में कांग्रेस खुद को बचाने में और भाजपा कांग्रेस को गिराने में ही जुटी थी और जब तक नई सरकार बनी तब कोरोना अपनी जड़ें कुछ जिलों में बहुत गहरी जमा चुका था. शिवराज 23 मार्च को मुख्यमंत्री बने, तो वो लगभग 28 दिनों तक अपनी कैबिनेट ही नहीं बना पाए. क्यूंकि, सिंधिया का दवाब था कि उनके खेमे से भी मंत्री पहली ही कैबिनेट में होना चाहिए. यही वज़ह है कि बहुत दवाब के बाद शिवराज ने कैबिनेट बनाई तो सिर्फ 5 मंत्रियों को लेकर.
लॉकडाउन खुलते ही मिनी कैबिनेट को मेगा में बदलने की चुनौती
अव्वल तो एमपी में कोई आसार नहीं हैं कि इन जिलों में 3 मई के बाद भी लॉकडाउन हटेगा. क्यूंकि, इन जिलों से एक भी दिन कोरोना को लेकर राहत भरी ख़बरें लेकर नहीं आया. फिर भी, जब ये लॉकडाउन हटेगा, सबसे पहले शिवराज को अपने मिनी कैबिनेट को मेगा कैबिनेट में तब्दील करना होगा. 22 विधायकों को इस्तीफ़ा दिलाकर भारी भरकम भीड़ लेकर भाजपा में शामिल हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया चाहेंगे कि उनके कम से कम 8 लोग इसमें शामिल हों. उधर, भाजपा के भी कई वरिष्ठ नेता कतार में हैं, जिनमें पूर्व नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव, पूर्व गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह, पूर्व खनिज मंत्री राजेद्र शुक्ल जैसे बड़े नाम शामिल हैं. जाहिर सी बात है कि उसमें इलाकाई और राजनैतिक संतुलन बैठाने में शिवराज को पसीने आ जायेंगे. जो नहीं शामिल हो पायेंगे, वो बगावत का सुर अख्तियार करेंगे.
शिवराज को जनता के बीच दिखाना होगा यह कौशल
लॉकडाउन हटने के बाद स्थितियां सामान्य होते ही 24 विधानसभा सीटों में उपचुनाव होगा, ये भी बहुत संघर्षपूर्ण होने की संभावना है. इनमें से 22 सीटें ऐसी हैं, जहां से पिछली बार भाजपा के नेता हारे थे, अब वहां से ताज़े भाजपाई हुए उन्हीं कांग्रेसियों को टिकट देना होगा, जो पिछली बार भाजपा को परास्त करके सदन में पहुंचे थे. उन्हें जिताना बहुत मशक्कत भरा होगा, क्यूंकि जनता कैसे उन्हें ग्राह करे, ये कौशल भी खुद शिवराज को ही दिखाना होगा. इसके लिए ज़रूरी है कि उस इलाके में किसानों, मजदूरों और आम आदमी के लिए सरकार ऐसा कुछ करे, जो उसके दिमाग में रजिस्टर हो सके. गेहूं की ख़रीदी को लेकर भी सरकार कोई चूक नहीं करना चाह रही है क्यूंकि ये कहा जाता है कि पिछली बार शिवराज सरकार को हटाने में किसानों की ही बड़ी भूमिका थी.
कुल मिलाकर चौथी बार मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चौहान की ये उनके राजनैतिक जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा की घडी है, यदि वे इसे ठीक से पार कर गए तो मध्यप्रदेश में आने वाले कई सालों तक उनका विकल्प नहीं होगा.

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