इंदौर में कोरोना का कहरः देश के सबसे स्वच्छ शहर की बदहाली के ये 4 कारण

इंदौर। मध्य प्रदेश के इंदौर में कोरोना का कहर कम होने का नाम नहीं ले रहा। शहर में वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 842 के पार पहुंच चुकी है। गुरुवार को इंदौर में इसके चलते 8 मौतें हुईं, जो एक दिन में सबसे ज्यादा है। देश के सबसे स्वच्छ शहर की इस हालत की कल्पना शायद ही किसी ने की हो, लेकिन आज शहर के रहवासी मौत के मुहाने पर खड़े हैं और इसकी जिम्मेदारी जितनी शासन-प्रशासन की है, उतनी ही स्थानीय लोगों की भी है।
जब देश और प्रदेश के दूसरे इलाकों में वायरस के संक्रमण की शुरुआत हुई थी, तब इंदौर जिला प्रशासन चैन की नींद सो रहा था। जब दूसरे राज्य लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के दिशा निर्देशों को अमली जामा पहना रहे थे, तब इंदौर की जनता शहर के प्रमुख इलाकों में रैलियां निकाल रही थी। आज हालत यह है कि गुरुवार रात तक पूरे राज्य में वायरस के संक्रमण से होने वाली 64 मौतों में 47 अकेले इंदौर में ही हुई हैं। 6 महीने के बच्चे से लेकर 75 साल के बुजुर्ग तक संक्रमण की जद में आ चुके हैं और हालत पर जल्दी नियंत्रण के कोई आसार नहीं दिख रहे।
अनियंत्रित संक्रमण के 4 बड़े वजह

  1. राजनीतिक उठापटक- राज्य प्रशासन भले इसे खुलकर स्वीकार नहीं करे, लेकिन यह सच्चाई है कि जब पूरे देश में लॉकडाउन की तैयारियां चल रही थीं, मध्य प्रदेश में राजनीतिक उठापटक का दौर चल रहा था। दोनों प्रमुख पार्टियां सोशल डिस्टेंसिंग को भूल अपनी खेमेबंदी मजबूत करने में लगी थीं। 24 मार्च को प्रधानमंत्री ने पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा की थी जबकि इसके एक दिन पहले शिवराज सिंह चौहान का शपथ ग्रहण हुआ था। शहर का पूरा प्रशासनिक अमला भी कोरोना से लड़ाई को भूल राजनीतिक उठापटक का गवाह बन रहा था। हालात अब भी करीब-करीब वैसे ही हैं। बिना कैबिनेट के सरकार चला रहे शिवराज अब भी बढ़ते संक्रमण के लिए पूर्ववर्ती कमलनाथ सरकार को जिम्मेदार बता रहे हैं। वहीं, नवभारत टाइम्स डॉट कॉम से बातचीत में कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे जीतू पटवारी उन पर झूठ बोलने का आरोप लगा रहे हैं। राज्य के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट ने भी कहा कि विपक्ष वायरस से मुकाबले के बदले राजनीति कर रही है।
  2. जमातियों का गैर जिम्मेदार व्यवहार- शहर के टाटपट्टी बाखल में परीक्षण के लिए गए डॉक्टरों के साथ स्थानीय लोगों के दुर्व्यवहार जैसी घटनाएं भी इंदौर की खराब हालत का बड़ा कारण हैं। टाटपट्टी बाखल के लोगों ने मीडिया में सार्वजनिक माफी भले मांग ली, लेकिन तब तक वायरस का संक्रमण विकराल रूप धारण कर चुका था। समस्या यह है कि ऐसी घटनाएं अब भी पूरी तरह रुकी नहीं हैं। शहर के अलग-अलग इलाकों से प्रशासन और डॉक्टरों की टीम के साथ पथराव और दुर्व्यवहार की घटनाएं अब भी सामने आ रही हैं। एक समुदाय विशेष के लोगों का मानना है कि शहर में वायरस के संक्रमण को बढ़ाने की साजिश रची जा रही है। कोरोना से लड़ाई के लिए प्रदेश सरकार द्वारा बनाए गए टास्क फोर्स के सदस्य राकेश सिंह ने भी बढ़ते संक्रमण के लिए जमातियों को जिम्मेदार ठहराया है।
  3. स्थानीय लोगों का अनियंत्रित व्यवहार- जनता कर्फ्यू के दिन इंदौर के प्रमुख इलाकों में रैलियां निकाली गईं। प्रधानमंत्री के ताली बजाने के आह्वान के बदले परदेशीपुरा और राजवाड़ा जैसे क्षेत्रों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। इसमें सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ गईं। शहर में कर्फ्यू लगने के बाद भी लोग सड़कों पर निकलने से बाज नहीं आए।
  4. प्रशासनिक सुस्ती- वायरस के संक्रमण की शुरुआत में स्थानीय प्रशासन मजबूती से इसका मुकाबला नहीं कर पाया। अधिकारी लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के प्रावधानों को कड़ाई से लागू करने में असफल रहे। तेजतर्रार आईएएस मनीष सिंह को कलेक्टर बनाए जाने के बाद हालात थोड़े सुधरे जरूर हैं, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती पूरी तरह खत्म नहीं हुई। परदेशीपुरा और राजवाड़ा जैसी घटनाओं में शामिल लोगों के खिलाफ अब तक खास कार्रवाई नहीं हुई। स्वास्थ्य विभाग का अमला भीहालात की गंभीरता को ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहा। गुरुवार को एक दिन में करीब 250 नए मामले सामने आने के बाद भी सीएचएमओ कह रहे हैं कि ये वो लोग हैं जिन्हें पहले से ही आइसोलेशन में रखा गया है।

हर दिन हो रही है मौत
इंदौर में कोरोना से अब तक 47 मौत हुई है। गुरुवार को सबसे ज्यादा 8 मौतें हुई हैं। बुधवार को कोरोना से 4 मौत हुई है। उससे पहले मंगलवार को भी कोरोना से 2 मौत हुई थी। इंदौर भारत का पहला ऐसा शहर है, जहां कोरोना से 2 डॉक्टरों की भी मौत हुई है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार अभी भी 12 से 15 लोगों की हालत गंभीर बनी हुई है। जबकि 40 लोगों की सेहत में तेजी से सुधार हुई है, जिनकी जल्द ही अस्पताल से छुट्टी हो सकती है।

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