मां कालरात्रि को लगाएं ऐसा भोग, मिलेगा मनचाहा वरदान

नवरात्रि में देवी के विभिन्न स्वरूपों की पूजा से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती है साथ ही देवी के नौ स्वरूपों की उपासना से विशेष इच्छाएं भी पूर्ण होती है। इन दिनों में साधक सात्विक रहकर मां की आराधना में लीन रहता है। माता की प्रतिपदा से लेकर नवमी तिथि तक उपासना की जाती है। शास्त्रोक्त मान्यता है कि नवरात्रि के नौ दिनों की आराधना करने से भक्तों की कई मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है और कठिन कष्टों का भी हरण हो जाता है।
माता कालरात्रि कै संबंध शनि ग्रह से है। कुंडली में शनि ग्रह का संबंध दसवें और ग्यारहवें भाव से होता है और रोजगार, आय लाभ से शनि का संबंध बताया जाता है। जिन लोगों की कुंडली में शनि ग्रह की पीड़ा है वो नवरात्रि की सप्तमी तिथि को देवी कालरात्रि की आराधना कर शनि ग्रह की पीड़ा का निवारण कर सकते है। माता कालरात्रि की आराधना से आलस्य से छुटकारा मिलता है, रोजगार के उत्तम अवसर प्राप्त होते हैं और शत्रुओं का नाश होता है।
देवी कालरात्रि का पूजन
दवी कालरात्रि के पूजन के लिए सर्वप्रथम स्नान आदि से निवृत्त होकर माता की एक पाट पर स्थापना करे। माता को अबीर, गुलाल, कुमकुम, मेहदी, हल्दी, अक्षत आदि चढ़ाएं। देवी को लाल गुड़हल के फूल या गुलाब के चढ़ाएं। माता के सामने घी का दीपक लगाए और धूपबत्ती जलाएं। माता को गुड़ का नैवेद्य अर्पित करें और इस नैवेद्य को ब्राह्मण को दे देवे। मान्यता है ऐसा करने से पुरुष शोकमुक्त होते हैं। मां काली को भोग में हलवा या दूध से बनी मिठाई भी चढ़ा सकते हैं। इसके अलावा सात चीकू मां को भोग लगाकर शाम को प्रसाद रूप में ग्रहण करें।
मां कालरात्रि का मंत्र
ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ऊं कालरात्रि दैव्ये नम:।
क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं स्वाहा।।
मां कालरात्रि का ध्यान मंत्र
करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥
दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥
महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥
मां कालरात्रि का कवच
ऊँ क्लीं मे हृदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥
रसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशंकरभामिनी॥
वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥

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