मध्यप्रदेश में कितने काम की विधान परिषद

भोपाल। मध्यप्रदेश में इन दिनों उच्च सदन यानी विधान परिषद के गठन की चर्चा गर्म है। कमलनाथ सरकार राज्यसभा की तर्ज पर कानूनी मसलों पर तार्किक बहस और राजनीतिक तौर पर समन्वय बनाने के लिए विधान परिषद का गठन करना चाहती है। इसी नजरिए को ध्यान में रखते हुए विधानसभा चुनाव-2018 से पहले कांग्रेस ने वचन पत्र में विधान परिषद के गठन का वादा किया था। कांग्रेस की सरकार बनने के बाद संसदीय कार्य विभाग ने इस पर तेजी से काम किया और विधि विभाग से प्रस्ताव का परीक्षण करवाकर मुख्यमंत्री कमलनाथ को भेज दिया। उनकी हरी झंडी मिलते ही इस पर कार्रवाई आगे बढ़ेगी।
देश में इस समय छह राज्यों आंध्रप्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में विधानसभा के साथ ही विधान परिषद हैं। बहस और चर्चा को महत्व मिलने के दमदार तर्क के बाद दूसरी दलील यह है कि विधान परिषद का गठन होने से न सिर्फ विधेयकों पर चर्चा होगी बल्कि वरिष्ठ राजनेताओं को मुख्यधारा में आने का मौका भी मिलेगा। विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने वचन पत्र (घोषणा) तैयार करने का जिम्मा वरिष्ठ नेता और विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ.राजेंद्र कुमार सिंह को सौंपा था। सिंह का कहना है कि विधान परिषद के गठन का वादा काफी सोच-समझकर किया गया है। मध्य प्रदेश विविधताओं से भरा प्रदेश है। गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र का प्रभाव यहां के विभिन्न् क्षेत्रों में देखने को मिलता है।
विधानसभा में राजनीतिक और अन्य वजहों से उन लोगों को प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है जो न सिर्फ अनुभव रखते हैं बल्कि प्रदेश की जरूरतों को समझते हैं। विधानसभा में इन दिनों जिस तरह से बिना चर्चा विधेयक पारित किए जाकर कानून की शक्ल ले रहे हैं वो भी चिंता का विषय है। कोई भी कानून बनने से पहले उसके सभी पहलुओं पर विस्तार से तार्किक चर्चा होनी चाहिए, जैसा राज्यसभा में होता है। इन सभी बातों देखते हुए विधान परिषद ही वो प्लेटफॉर्म है जो सभी जरूरतों को पूरा करता है।
यहां तक पहुंची है बात : संसदीय कार्यमंत्री डॉ. गोविंद सिंह के निर्देश पर विभाग ने मसौदा तैयार करके कानूनी दृष्टि से विधि एवं विधायी विभाग से प्रारंभिक परीक्षण भी करवा लिया है। विधि विभाग ने एक बार तो विधान परिषद गठन के प्रस्ताव को यह कहते हुए वापस लौटा दिया कि इसके लिए केंद्र सरकार की अनुमति लगेगी लेकिन जब यह बताया गया कि मध्य प्रदेश में विधान परिषद के गठन का प्रावधान पहले से है तो फिर बाकी पहलुओं का अध्ययन शुरू हुआ। इसे मुख्यमंत्री कमलनाथ के पास भेजा गया है। अधिकारियों का कहना है कि मुख्यमंत्री का इशारा मिलते ही वित्त और शिक्षा विभाग का अभिमत लेकर कार्रवाई की जाएगी। उधर, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव का कहना है कि विधान परिषद के गठन के पीछे सरकार ने अपनी मंशा जाहिर नहीं की है। इस मामले में राज्य सरकार जब कोई ठोस कदम उठाएगी तो फिर उस पर हाईकमान से चर्चा करके भाजपा अपनी लाइन तय करेगी।
सरकार का खर्च बढ़ना तय : विधायी और कानूनी मामलों के जानकार विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव भगवानदेव ईसरानी का कहना है कि यह राजनीतिक निर्णय है। सरकार को तय करना है कि उसे परिषद रखनी है या नहीं। कानूनी तौर पर सरकार इसका गठन कर सकती है। इसका प्रावधान भी है। इसका गठन होने से सरकार का खर्चा भी बढ़ेगा क्योंकि परिषद के सदस्य को विधायकों की तरह पूरी सुविधाएं मिलती हैं। स्टाफ भी बढ़ाना पड़ेगा।
वर्ष 1966 में केंद्र जारी कर चुका है अधिसूचना : प्रदेश में विधान परिषद के गठन का संविधान के अनुच्छेद 168 में भी प्रावधान हैं। चार अक्टूबर 1966 को कैबिनेट ने विधान परिषद के गठन का निर्णय किया और केंद्र सरकार को अवगत कराया। केंद्र सरकार ने 23 दिसंबर 1966 को बैठक तय करने के लिए अधिसूचना जारी कर दी। इसमें 15 अगस्त 1967 से परिषद का गठन करने का प्रस्ताव था। इस बीच एक अगस्त 1967 को तत्कालीन मुख्यमंत्री ने केंद्रीय गृह मंत्री को बैठक न करने की सूचना दी। इसमें प्रदेश की वित्तीय स्थिति का हवाला दिया। 11 अगस्त 1967 को अधिसूचना निरस्त कर दी गई।
लगभग 40 करोड़ रुपए आएगा खर्च : संसदीय कार्य विभाग की मानें तो विधान परिषद के गठन में प्रारंभिक रूप से लगभग 40 करोड़ रुपए का वित्तीय भार आएगा। विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ.राजेंद्र कुमार सिंह का कहना है कि परिषद के सदस्यों को विधायकों के समान वेतन-भत्ते सहित अन्य सुविधाएं मिलेंगी। विधान परिषद का सचिवालय बनेगा और लगभग 250 कर्मचारियों की जरूरत पड़ेगी। अधोसंरचना विकास पर ज्यादा खर्च नहीं करना होगा क्योंकि विधानसभा में ही विधान परिषद के लिए पहले से बैठक व्यवस्था बनी हुई है।
76 सदस्य हो सकते हैं
सूत्रों का कहना है कि परिषद में 76 सदस्य हो सकते हैं। इसमें दो-तिहाई सदस्यों का द्विवार्षिक चुनाव होगा। सदस्यों का कार्यकाल छह साल रखा जा सकता है। परिषद का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष होना चाहिए। परिषद के सदस्यों में अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के लिए कोई स्थान आरक्षित नहीं होता है। नगर पालिका से एक तिहाई सदस्य आते हैं। हालांकि, इन प्रस्तावित प्रावधानों में नए संदर्भों में बदलाव भी किया जा सकता है।
खास बातें

  • संविधान का अनुच्छेद-71 राज्यों को यह अधिकार देता है कि वे चाहें तो विधान परिषद का गठन कर सकते हैं।
  • राज्यसभा की ही तरह इसके सदस्य भी सीधे मतदाताओं द्वारा नहीं चुने जाते।
    विरोध के पीछे तक
  • फैसलों में देरी की वजह बनती है और उन नेताओं का बोझ सहन करती है तो चुनाव जीतने में सक्षम नहीं हैं।
  • राज्यसभा की तरह विधान परिषद को खास शक्तियां नहीं मिली हुई हैं।
    इतिहास पुराना : विधानसभा में हो चुकी है जमकर बहस
    विधान परिषद के गठन को लेकर विधानसभा में भी जमकर बहस हो चुकी है। पांच जुलाई 1967 को मध्य प्रदेश विधान मंडल सदस्य वेतन तथा भत्ता विधेयक प्रस्तुत हुआ था। इस पर चर्चा के दौरान कृष्णकुमार नूतन ने कहा था कि परिषद के गठन का उद्देश्य सिर्फ राजनीतिक है। हमारा प्रदेश आर्थिक रूप से पिछड़ा है। उन्होंने मिसाल देते हुए कहा कि परिषद में कुरवाई के नवाब की बेटी केशरजहां को सदस्य बनाकर मंत्री बनाएंगे। इस तरह के प्रलोभन अन्य लोगों को भी दिए गए थे। विधि मंत्री रामगोपाल तिवारी ने कहा था कि अभी परिषद का निर्माण नहीं होने जा रहा है। आज वित्तीय परिस्थिति अच्छी नहीं है जब अच्छी होगी तब निर्माण होगा।
    विधान परिषद इसलिए जरूरी है क्योंकि जो भी कानून इस सदन से पारित होते हैं उसका समाज पर प्रभाव पड़ता है। उस पर समुचित रूप से विचार होना चाहिए ताकि कोई त्रुटि न रहे। अनेक व्यक्ति चुनाव में भाग नहीं लेते हैं। विशेष जानकार लोग कार्यवाहियों में भाग ले सकें इसलिए ऐसा प्रावधान बनाया गया है। यही नहीं, 30 मार्च 2007 को तत्कालीन संसदीय कार्यमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने विधायक सरोज बच्चन नायक के सवाल के जवाब में कहा था कि प्रदेश सरकार विधान परिषद के गठन पर विचार नहीं कर रही है। फिलहाल इसकी कोई आवश्यकता नहीं है।

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