एक दूसरे पर पत्थर बरसाने के साथ शुरू हुआ गोटमार, 100 से ज्यादा लोग घायल

पांढुरना। क्षेत्र में परंपरागत गोटमार मेले का आयोजन प्रारंभ हो गया है। श्रद्धालुओं ने गोटमार की शुरूआत से पहले पलाश के वृक्ष की स्थापना की, ध्वज लगाने के साथ ही मां चंडिका के मंदिर में श्रद्धालुओं ने दर्शन किए। इसके बाद युद्ध का दौर शुरू हुआ। लोगों ने एक दूसरे पर पत्थर बरसाए, जिसके चलते शुरूआती दौर में ही 11 लोग घायल हो गए, घायलों में 1 व्यक्ति के गंभीर घायल हो जाने और उसकी हालत बिगड़ने पर उसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र व अस्पताल ले जाया गया। इस दौरान पुलिस का व्यापक बंदोबस्त किया गया।
गोटमार मेले की शुरुआत 17वीं ई. के लगभग मानी जाती है। महाराष्ट्र की सीमा से लगे पांर्ढुना हर वर्ष भादो मास के कृष्ण पक्ष में अमावस्या पोला त्योहार के दूसरे दिन पांर्ढुना और सावरगांव के बीच बहने वाली जाम मे वृक्ष की स्थापना कर पूजा अर्चना कर नदी के दोनों ओर बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं और सूर्योदय से सूर्यास्त तक पत्थर मारकर एक-दूसरे का लहू बहाते हैं। इस घटना में कई लोग घायल हो जाते हैं। इस पथराव में लगभग 13 लोगों की मौत भी हुई है। इतना ही नहीं कई लोगों ने अपने शरीर के महत्वपूर्ण अग भी खोए हैं जो अपने जीवन मे मेले को गलत मानते हैं और इस पर अफसोस भी जताते हैं।
गोटमार से पहले होती है ध्वज स्थापना
पलाश के वृक्ष के झंडे की स्थापना हो चुकी है। पूजा -अर्चना के बाद मन्नतों का दौर चल रहा है। लगभग एक घण्टे बाद गोटमार शुरू हो सकती है। दो पक्षों के बीच एक दूसरे पर पत्थर बरसाने का सिलसिला शुरू होकर दिन भर चलेगा और लगभग शाम 6 बजे पलाश के वृक्ष के झंडे को पांढुर्ना पक्ष के लोग काटकर माँ चण्डिका के मंदिर मे अर्पण कर गोटमार मेले को खत्म करेंगे। इस दौरान सैकड़ों लोग पत्थरबाजी के चलते घायल भी होंगे।
परंपरा धार्मिक आस्था का प्रतीक मानते हैं
नगर के बीच में नदी के उस पार सावरगांव और इस पार को पांढुर्ना कहा जाता है। कृष्ण पक्ष के दिन यहां बैलों का त्यौहार पोला धूमधाम से मनाया जाता है। इसी के दूसरे दिन साबरगांव के सुरेश कावले परिवार की पुश्तैनी परम्परा स्वरूप जंगल से पलाश के वृक्ष को काटकर घर पर लाने के बाद उस वृक्ष की साज-सज्जा कर लाल कपड़ा, तोरण, नारियल, हार और झाड़ियां चढ़ाकर पूजन किया जाता है। दूसरे दिन सुबह होते ही लोग उस वृक्ष को जाम नदी के बीच गाड़ते हैं और फिर पांढुर्ना पक्ष के लोग अपनो मन्नतों के अनुरूप झंडे की पूजा करते हैं और फिर सुबह 8 बजे से शुरू हो जाता है एक दूसरे को पत्थर मारने का सिलसिला, जो देर शाम तक चलता है।
दिन भर होती है एक-दूसरे पर पत्थरों की बारिश
ढोल ढमाकों के बीच लगाओ-लगाओ के नारों के साथ कभी पांर्ढुना के खिलाड़ी आगे बढ़ते हैं तो कभी सावरगांव के खिलाड़ी। दोनों एक-दूसरे पर पत्थर मारकर पीछे ढकेलने का प्रयास करते है और यह क्रम लगातार चलता रहता है। दर्शकों का मजा दोपहर बाद 3 से 4 के बीच बढ़ जाता है। खिलाड़ी चमचमाती तेज धार वाली कुल्हाड़ी लेकर झंडे को तोड़ने के लिए उसके पास पहुंचने की कोशिश करते हैं। ये लोग जैसे ही झडे के पास पहुंचते हैं साबरगांव के खिलाड़ी उन पर पत्थरों की बारिश कर देते हैं और पाढुर्णा वालों को पीछे हटा देते हैं।
शाम को पांर्ढुना पक्ष के खिलाड़ी पूरी ताकत के साथ चंडी माता का जयघोष एवं भगाओ-भगाओ के साथ सावरगांव के पक्ष के व्यक्तियों को पीछे ढकेल देते है और झंडा तोड़ने वाले खिलाड़ी, झंडे को कुल्हाडी से काट लेते हैं। जैसे ही झंडा टूट जाता है, दोनों पक्ष पत्थर मारना बंद करके मेल-मिलाप करते हैं और गाजे बाजे के साथ चंडी माता के मंदिर में झंडे को ले जाते है।
झंडा न तोड़ पाने की स्थिति में शाम साढ़े छह बजे प्रशासन द्वारा आपस में समझौता कराकर गोटमार बंद कराया जाता है। पत्थरबाजी की इस परंपरा के दौरान जो लोग घायल होते है, उनका शिविरों में उपचार किया जाता है और गंभीर मरीजों को नागपुर भेजा जाता है।
इसके पीछे की ये है कहानी
इस मेले के आयोजन के संबंध में कई प्रकार की किवंदतियां हैं। इन किवंदतियों में सबसे प्रचलित और आम किवंदती यह है कि सावरगांव की एक आदिवासी कन्या का पांर्ढुना के किसी लड़के से प्रेम हो गया था। दोनों ने चोरी छिपे प्रेम विवाह कर लिया। पांर्ढुना का लड़का साथियों के साथ सावरगांव जाकर लड़की को भगाकर अपने साथ ले जा रहा था। उस समय जाम नदी पर पुल नहीं था। नदी में गर्दन भर पानी रहता था, जिसे तैरकर या किसी की पीठ पर बैठकर पार किया जा सकता था और जब लड़का लड़की को लेकर नदी से जा रहा था तब सावरगांव के लोगों को पता चला और उन्होंने लड़के व उसके साथियों पर पत्थरों से हमला शुरू किया। जानकारी मिलने पर पहुंचे पांर्ढुना पक्ष के लोगों ने भी जवाब में पथराव शुरू कर दी। पांर्ढुना और सावरगां के बीच इस पत्थरों की बौछारों से इन दोनों प्रेमियों की मृत्यु जाम नदी के बीच ही हो गई।
दोनों प्रेमियों की मृत्यु के पश्चात दोनों पक्षों के लोगों को अपनी शर्मिंदगी का एहसास हुआ और दोनों प्रेमियों के शवों को उठाकर किले पर माँ चंडिका के दरबार में ले जाकर रखा और पूजा-अर्चना करने के बाद दोनों का अंतिम संस्कार कर दिया गया। संभवतः इसी घटना की याद में माँ चंडिका की पूजा-अर्चना कर गोटमार मेले का आयोजन किया जाता है।
प्रशासनिक तैयारियों के तहत धारा 144 लागू
वर्ष 2009 में मानवाधिकार आयोग के दखल के बाद जिला प्रशासन ने पांर्ढुना- सावरगांव के बीच होने वाले गोटमार मेले में पत्थर फेंकने पर रोक लगाने अनेकों प्रयास किए, लेकिन आज तक मेले का स्वरूप नही बदल सके। क्षेत्र में इस बार जिला प्रशासन ने गुरुवार की दोपहर से धारा 144 लागू कर दी। आस्था से जुड़ा होने के कारण इसे रोक पाने में असमर्थ प्रशासन व पुलिस एक दूसरे का खून बहाते लोगों को असहाय देखते रहने के अलावा और कुछ नहीं कर पाते।
निर्धारित समय अवधि में पत्थरबाजी समाप्त कराने के लिए प्रशासन और पुलिस के अधिकारियों को बल प्रयोग भी करना पड़ता है। कई बार प्रशासन ने पत्थरों की जगह तीस हजार रबर की छोटे साइज की गेंद उपलब्ध कराई थी,परंतु दोनों गांवों के लोगों ने गेंद का उपयोग नहीं करते हुए पत्थरों का उपयोग ही किया था।
पिछले वर्ष खिलाड़ियों को हेलमेट भी दिए थे
प्रशासन अपने स्तर पर प्रति वर्ष नए प्रयास करता है, लेकिन आस्था के सामने प्रशासन ने दोनों गांवों के लोगों को नदी के दोनों किनारों पर पत्थर उपलब्ध कराना शुरू कर दिया है।
बुराइयां शराब,जुआ,गोफन से फेकते पत्थर
गोटमार मेले में समय के साथ कई बुराइयां भी शामिल हो गई हैं। गोटमार के दिन शहर में खुले आम शराब का सेवन करते हैं तथा प्रतिबंधों के बावजूद गोफन के माध्यम से तीव्र गति और अधिक दूरी तक पत्थर फेंकते हैं जिससे मेला स्थल के लोग घायल होने का खतरा बढ़ जाता है।

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