मध्‍यप्रदेश में ‘बाबा’ अब ब्लैकमेलिंग की राजनीति पर उतरे

भोपाल। मध्य प्रदेश की सियासत में पिछले कुछ सालों से बाबाओं की चर्चा जोरों पर है। पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के कार्यकाल में कंप्यूटर बाबा और अन्य कुछ महंत करोड़ों पौधे लगाए जाने की फर्जीवाड़े के खिलाफ यात्रा निकाल रहे थे तब चुनाव के पहले शिवराज सरकार ने दो बाबाओं को राज्यमंत्री का दर्जा देकर मुंह बंद कर दिया। प्रदेश में सरकार बदलने से पहले ही कंप्यूटर बाबा ने पाला बदला और अब कांग्रेस की कमलनाथ सरकार में भी सरकारी पद व रुतबे का लुत्फ उठा रहे हैं। अब नए बाबा आए हैं देवमुरारी बापू। उन्होंने सीधे मांग कर दी कि गो-संवर्धन बोर्ड का अध्यक्ष बनाओ, वरना मुख्यमंत्री निवास पर आत्मदाह कर लूंगा। डर के मारे सरकार के मंत्री गए, बाबा को मनाने और कहा कि सितंबर के पहले आपको भी नवाज दिया जाएगा, तब माने बाबा।
चुनाव से पहले खोला भाजपा के खिलाफ मोर्चा
कंप्यूटर बाबा यानी नामदेव त्यागी ने नर्मदा में अवैध खनन का आरोप लगाते हुए शिवराज सरकार के खिलाफ विधानसभा चुनावों से महीना भर पहले मोर्चा खोला था। उन्होंने संत समागम के नाम से अभियान शुरू किया था। तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह चौहान ने कंप्यूटर बाबा समेत पांच धार्मिक नेताओं को अप्रैल 2018 में राज्यमंत्री का दर्जा दिया था, लेकिन कंप्यूटर बाबा ने इसके कुछ समय बाद ये आरोप लगाते हुए इस दर्जे से इस्तीफा दे दिया था कि शिवराज सरकार ने खासकर नर्मदा को स्वच्छ रखने और इस नदी से अवैध रेत खनन पर रोक लगाने के मामले में संत समुदाय से वादाखिलाफी की है।
आचार्य देवमुरारी बापू ने खुदकशी करने की दी धमकी
वृंदावन के आचार्य देवमुरारी बापू ने इसी सप्ताह सोमवार को यहां मुख्यमंत्री निवास के सामने आत्महत्या करने का एलान किया था। वह सरकार से अपने लिए मध्य प्रदेश गो-संवर्धन बोर्ड में एक पद की मांग कर रहे हैं। रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के बाद बताया कि ‘मैंने पिछले साल नवंबर में मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस को समर्थन देकर उसके पक्ष में प्रचार किया था। संतों के समर्थन के बिना मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार नहीं बन सकती थी, लेकिन कांग्रेस सरकार हमारी बात नहीं सुन रही है। मैंने कमलनाथ से मांग की थी कि 15 अगस्त तक मप्र गो-संवर्धन बोर्ड में मेरी नियुक्ति की जाए, ताकि मैं गोसेवा कर सकूं, लेकिन यह मांग भी अनसुनी कर दी गई। उन्होंने कहा कि इससे मैं आहत हूं और मुख्यमंत्री निवास के सामने आत्महत्या करूंगा, हालांकि बाद में उन्हें एक मंत्री ने मना लिया, इस वादे के साथ कि सितंबर के पहले आपको नियुक्ति दी जाएगी।
इनका कहना है
संतों का राजनीति में आना गलत नहीं है पर स्वार्थ के लिए राजनीति में नहीं आना चाहिए। राजनीति के माध्यम से परमार्थ किया जा सकता है। समाज का उत्थान किया जा सकता है पर पद पाने के लिए किसी तरह का पाखंड का मार्ग अपनाना संत परपंरा को कलंकित करने जैसा है। 
– परमहंस अवधेशपुरी महाराज, पूर्व महामंत्री अखाड़ा परिषद उज्जैन
यह वाकया निंदनीय
जहां तक देवमुरारी की बात है तो वे प्रवचन करने वाले हैं, साधु-संत नहीं हैं, इसलिए उन्होंने ब्लैकमेलिंग का रास्ता अपनाया पर किसी भी दबाव से सरकार नहीं चलती है। ये संगठन का काम है, किसे कहां क्या काम दें पर यह वाकया निंदनीय है। इससे सारे समाज के सम्मान को ठेस पहुंची है। चुनाव में तो हजारों संतों ने काम किया तो क्या सभी को सरकार में शामिल कर लेंगे। 
– कंप्यूटर बाबा, अध्यक्ष नर्मदा क्षिप्रा मंदाकिनी नदी न्यास

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *