कौन है 92 की उम्र में “राम मंदिर” के लिए “सुप्रीम कोर्ट” में घंटों खड़े होकर बहस करने वाला विद्वान वकील ?

“यह मेरी अंतिम इच्छा है कि मरने से पहले मैं इस मामले को अंजाम तक पहुँचा दूँ। मैं अपने श्रीराम के लिए इतना तो कर ही सकता हूँ।92 की उम्र में राम मंदिर केस को अंजाम तक पहुँचानाही मेरी अंतिम इच्छा है”
अगर आप अदालती कार्यवाहियों का हिस्सा रहे हैं या फिर आपने यह व्यवस्था देखी है तो आपको पता होगा कि वकील खड़े होकर बहस करते हैं। कम से कम फ़िल्मों में तो आपने देखा ही होगा। इसी महीने पिछले सप्ताह में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मुद्दे पर अदालत की सुनवाई चल रही थी और रामलला की तरफ से अदालत में एक वकील पैरवी कर रहे थे। पीठ की अध्यक्षता ख़ुद सीजेआई रंजन गोगोई कर रहे थे।
तभी बीच में सीजेआई गोगोई ने वकील से पूछा, “क्या आप बैठ कर दलीलें पेश करना चाहेंगे?” लेकिन, उस वकील ने कहा, “मिलॉर्ड आप बहुत दयावान हैं लेकिन वकीलों की परंपरा रही है कि वे सुनवाई के दौरान खड़े होकर दलीलें पेश करते रहे हैं और मैं इस परम्परा से लगाव रखता हूँ।”
क्या आपको पता है कि ये वकील कौन हैं? राम मंदिर से हिंदुओं की आस्थाएँ जुड़ी हैं। ऐसे में वो कौन है, जो 92 की उम्र में भी घंटों खड़े होकर दलीलें दे रहा है, हिदुत्व की लड़ाई लड़ रहा है, यह पता तो होना ही चाहिए। जज और वकील का यह कन्वर्सेशन अदालत के इतिहास में एक रोचक और अच्छी याद बन कर दर्ज हो गया।
राम मंदिर की तरफ से पक्ष रख रहे 92 वर्षीय वकील का नाम है- के. पराशरण।
तमिलनाडु के अधिवक्ता जनरल रहे पराशरण के अनुभवों के बारे में अंदाजा लगाना हो तो जान लीजिए कि वह इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में ही भारत के अटॉर्नी जनरल रह चुके हैं।
हालाँकि, 2016 के बाद पराशरण अदालती कार्यवाहियों में कम ही दिखते हैं और और चुनिन्दा मामलों में ही अदालत जाते हैं। चेन्नई से दिल्ली तक के इस सफ़र में उन्होंने न जाने कितने अच्छे-बुरे दौर देखे।
उन्होंने सबरीमाला मंदिर मामले में भी पैरवी की थी। उन्हें हिंदुत्व का विद्वान माना जाता है। 2012 से लेकर 2018 तक राज्यसभा सांसद रह चुके पराशरण 70 के दशक से ही अधिकतर सरकारों के फेवरिट वकील रहे हैं। धार्मिक पुस्तकों का उन्हें इतना ज्ञान है कि वह अदालत में बहस के दौरान भी उनका जिक्र करते रहते हैं। मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजय किशन कॉल के शब्दों में “पराशरण भारतीय वकालत के पितामह हैं जिन्होंने बिना धर्म से समझौता किए भारतीयों के लिए इतना बड़ा योगदान दिया।”
पराशरण ने सबरीमाला मंदिर विवाद के दौरान महिलाओं की एंट्री की अनुमति न दिए जाने के लिए पैरवी की। उन्होंने श्रद्धालुओं की राय अदालत में अपने मजबूत दलीलों के साथ रखी। राम सेतु मामले में तो दोनों ही पक्षों ने उन्हें अपनी साइड करने के लिए सारे तरकीब आजमाए लेकिन धर्म को लेकर संजीदा रहे पराशरण ने रामसेतु सरकार के ख़िलाफ़ पैरवी करना उचित समझा। ऐसा उन्होंने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट से रामसेतु को बचाने के लिए किया। उन्होंने अदालत में कहा, “मैं अपने श्रीराम के लिए इतना तो कर ही सकता हूँ।“
के. पराशरण के पिता वेदों के विद्वान थे, अतः कहा जा सकता है कि ये संस्कार उन्हें विरासत में मिले हैं, जिसे उन्होंने एक नया आयाम दिया। बाबरी मस्जिद पक्ष के वकील राजीव धवन को अदालत की रोजाना सुनवाई से दिक्कतें थीं और उन्होंने प्रतिदिन सुनवाई ना करने की अपील की, जिसे अदालत ने ठुकरा दिया।
लेकिन, क्या आपको पता है इसे लेकर पराशरण क्या कहते हैं? वो कहते हैं, “यह मेरी अंतिम इच्छा है कि मरने से पहले मैं इस मामले को अंजाम तक पहुँचा दूँ।“

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