होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो…

इंदौर। ‘दौलत न अता करना मौला, शोहरत न अता करना मौला, बस इतना अता करना चाहे, जन्नत न अता करना मौला, शमाए-हक की लौ पर, जब कुरबान पतंगा हो, होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा होऽऽऽऽ…’ अल्फाजों की इस बाजीगरी के साथ हजारों लोगों के दिलों में जोश की लहर दौड़ाकर बेशक देश के ख्यात कवि डॉ. कुमार विश्वास ने अपनी सभा को विराम दिया, लेकिन यह विराम उन तमाम प्रस्तुतियों का सार था, जिसे उन्होंने अपनी करीब दो घंटे की पेशकश में प्रस्तुत किया था। रविवार की रात अभय प्रशाल में कभी व्यंग्य के बाण चले तो कभी वतन को सलाम करती रचनाएं पढ़ी गईं। अल्फाज और पंक्तियां चाहे कोई भी हों, सभी का सार केवल और केवल देश की सलामी पर आकर ठहर रहा था।
‘रंग देस’ नाम से हुए इस आयोजन में यूं तो हर गीत, कविता और शेर पर तालियों की बारिश हुई पर जब बात देश की जन्न्त कश्मीर की आई तो कुमार विश्वास ने जो सुर छेड़े उसने हर श्रोता के दिल को छू लिया। ‘ऋषि कश्यप की तपस्या ने तपाया है तुझे, ऋषि अगस्त ने हमवार बनाया है तुझे, कभी लंदन में भी राबिया ने गाया उसको, बाबा बर्फानी ने दरबार बनाया है तुझे, तेरी झीलों की मोहब्बत में है पागल बादल, मां के माथे पे दमकते हुए पावन आंचल, तेरी सरगोश पर कुर्बान पूरा वतन, मेरे कश्मीर मेरी जान मेरे प्यारे चमन’ गीत के हर शब्द अगर तारीफों की चाशनी में डूबे हुए दिलों में बस रहे थे तो धारा 370 के वक्त कश्मीर पर की गई टिप्पणियों पर भी उन्होंने तीखे तेवर दिखाए।

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