क्षेत्रीय दलों ने राज्यसभा में तीन तलाक बिल पर कांग्रेस को दिया गच्चा, यह नए राजनीतिक समीकरण का संकेत है?

नई दिल्ली. राज्यसभा में ऐंटि-बीजेपी कैंप का पिछले पांच साल का दबदबा पिछले हफ्ते ही दरक चुका था, जब सूचना का अधिकार कानून (आरीआई ऐक्ट) संशोधन विधेयक पर विपक्ष बंट गया। तीन तलाक बिल पर बीजेपी विरोधी विचारों के बंटवारे का निहितार्थ राज्यसभा में महज आंकड़ों के गणित में बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘सेक्युलर’ ब्लॉक में उस वक्त बिखराव की दास्तां है जब भगवा ब्रिगेड की पकड़ लगातार मजबूत हो रही है।
BJP के महाविजय से बदला राजनीतिक परिदृश्य
ऐसा जान पड़ता है कि इस बार के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के महाविजय ने ‘धर्मनिरपेक्ष धड़े’ की राजनीतिक सोच बदल दी है। जेडीयू, टीआरएस, आरजेडी, टीडीपी, एनसीपी, एसपी और बीएसपी जैसे क्षेत्रीय दलों की कांग्रेस और वाम दलों के साथ एकजुटता के कारण ही तीन तलाक बिल दो वर्षों से लटका हुआ था।बीजेपी को नरेंद्र मोदी के मातहत 2014 से 2019 के बीच लगातार मजबूत होता देख कांग्रेस के अंदर यह सोच घर करने लगी कि उसे उन मुद्दों पर नरमी बरतनी चाहिए जिन्हें भगवा ब्रिगेड ‘तुष्टीकरण’ के माध्यम का ठप्पा लगाने में सफल रहा है। यही वजह है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मंदिरों का लगातार दौरा करने लगे।
तीन तलाक बिल यूं फंसी कांग्रेस
कहा जा रहा है कि एकसाथ तीन तलाक देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने छवि बदलने को छटपटा रही कांग्रेस को एक आसान रास्ता दे दिया, लेकिन वह इस बिल में तीन तलाक को ‘अपराध’ बनाने के प्रस्ताव पर फंस गई। पार्टी का एक मजबूत धड़ा इस प्रस्ताव के खिलाफ मुखर हो गया। कांग्रेस भले ही असमंजस में फंस गई, लेकिन ज्यादातर क्षेत्रीय दल सरकार का साथ देने में नहीं हिचके, जैसा कि मंगलवार को राज्यसभा में देखने को मिला। वे बिल के विरोध में सदन से वॉकआउट कर गए। हालांकि, हकीकत में यह सरकार को समर्थन देने का महफूज तरीका था।
क्षेत्रीय दलों का अलग-अलग गणित
इन क्षेत्रीय दलों में किसी ने बिल का विरोध करने के दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं किया तो इसका मतलब है कि वे 2019 चुनाव परिणाम के बाद की सियासी हकीकत से वाकिफ हैं और सरकार से कुछ राहत चाहते हैं। समाजवादी पार्टी (एसपी) और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) बीजेपी के साथ नहीं हैं, फिर भी शायद जांच एजेंसियों से राहत मिलने की उम्मीद में बिल के साथ आ गए। वहीं, तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने बीजेपी के करीब होकर भी बिल का सीधा समर्थन नहीं किया क्योंकि उनके शासन वाले राज्यों क्रमशः तेलंगाना और बिहार में अल्पसंख्यक आबादी की अच्छी-खासी आबादी है और दोनों पार्टियां अपनी ‘धर्मनिरपेक्ष’ छवि पर प्रत्यक्ष आघात नहीं चाहतीं।
क्या करें, क्या न करें की उहापोह में कांग्रेस
इन परिस्थितियों में कांग्रेस के सामने अकेले पड़ने का बड़ा खतरा मंडरा रहा है। उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उसे तथाकथित विभाजनकारी मुद्दों पर बीजेपी का साथ देने वाली छवि बनने से खुद को बचना है। एक वरिष्ठ नेता के बयान में कांग्रेस की उहापोह वाली स्थिति की स्पष्ट झलक मिलती है। उन्होंने कहा, मौजूदा व्यावहारिक राजनीति की मांग है कि हम लिंचिंग, ‘अल्पसंख्यक हितों, मानवाधिकारों और आरटीआई जैसे उदारवादी मूल्यों से किनारा कर लें। लेकिन, तब कांग्रेस और बीजेपी के बीच क्या फर्क रह जाएगा?’
कांग्रेस को मार रहा है ध्रुवीकरण का डर
क्षेत्रीय दलों ने इन सभी मुद्दों पर ही इस हफ्ते कांग्रेस से कई बार किनारा किया। ऐसे में कहा जा सकता है कि यह कांग्रेस के लिए मनहूस दौर है। देश की मुख्य विपक्षी पार्टी अभी ऐसे लड़ रही है जैसे यह उसके अस्तित्व की लड़ाई हो। कांग्रेस हिंदुत्व के लगातार बढ़ते उन अजेंडों का मुखर विरोध कर रही है, जिन्हें साफ-साफ ध्रुवीकरण की राजनीति साबित कर पाना कठिन है। ऐसे में मुश्किल यह है कि अगर वह अपनी स्पष्ट परांपरागत वैचारिक राजनीति से चिपकी रही तो ध्रुवीकरण को बल मिलेगा। अगर वह अपना रुख नरम रखती है तो उसके सामने धीरे-धीरे गौण हो जाने का खतरा पैदा हो जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *