मध्‍यप्रदेश में राजनीतिक उठापटक और चुनौतियों के 183 दिन

भोपाल। मप्र के मुख्यमंत्री के नाते कमलनाथ सोमवार को अपने कार्यकाल के छह महीने पूरे कर रहे हैं। बहुमत के आंकड़े की सीमा पर खड़ी कांग्रेस सरकार के मुखिया के लिए इन छह महीनों के 183 दिन चुनौती भरे रहे हैं। अपने ही विधायकों के साथ सहयोगी दल व निर्दलीय विधायकों का दबाव और विरोधी दल के असहयोगात्मक रवैए की चुनौतियों से कमलनाथ पूरे समय जूझते रहे। इस बीच लोकसभा चुनाव की तीन माह लंबी प्रक्रिया के चलते विकास कार्य प्रभावित हुए और चुनावी वादे भी पूरे नही हो पाए। इसका खामियाजा कांग्रेस को लोकसभा चुनाव परिणामों में भुगतना भी पड़ा।
डेढ़ दशक तक सत्ता से दूर रही कांग्रेस की सूबे में सरकार तो बनी, लेकिन बहुमत के किनारे वाली। पूर्ण बहुमत न होने का असर मुख्यमंत्री के हर फैसले में झलका। यह पहली ऐसी सरकार है, जिसमें एक भी राज्यमंत्री नहीं है। कमलनाथ ने अपने सारे मंत्रियों को कैबिनेट का दर्जा दिया। ऐसा इसलिए, क्योंकि कांग्रेस के तमाम क्षत्रप अपने समर्थक मंत्रियों के लिए राज्यमंत्री का दर्जा नहीं चाह रहे थे।
कमलनाथ के सामने अपने दल के नेताओं को साधना तो चुनौतीपूर्ण रहा ही, समर्थन दे रहे निर्दलीय और बसपा सपा के विधायकों को भी सहेजकर रखना भी कम मुश्किल भरा नहीं रहा। चार में से एक निर्दलीय को मंत्री बनाकर उन्होंने बाकी के निर्दलीय और बसपा-सपा विधायकों की हसरतें जगा दीं।
बसपा विधायक रामबाई और निर्दलीय विधायक ठाकुर सुरेंद्र सिंह ने शपथ लेने के बाद से अब तक कई बार मंत्री बनाए जाने के लिए दबाव बनाया। धमकाने वाले लहजे में उन्होंने बयानबाजी भी की। कांग्रेस पार्टी के ही वरिष्ठ विधायकों कुंवर विक्रम सिंह नातीराजा, केपी सिंह, एंदल सिंह कंसाना ने भी कमलनाथ सरकार में मंत्री नहीं बनाए जाने पर शुरुआत में अपनी नाराजगी का अहसास कराया। हालांकि हाल में इनके स्वर बदले हैं। सुनने में आ रहा है कि शीघ्र ही मंत्रिमंडल विस्तार हो रहा है, जिसमें नाराज विधायकों को एडजस्ट करने की कोशिश की जाएगी।
पंद्रहवीं विधानसभा के पहले सत्र से मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार ने अग्निपरीक्षा देना शुरू किया। विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में भाजपा ने अपने प्रत्याशी उतारकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की, जिसमें उसके हाथ असफलता ही लगी। कमलनाथ इसे फ्लोर टेस्ट मानते हैं। इस बीच मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किए जाने पर बसपा व निर्दलीय विधायकों की धमकियां आना शुरू हो गईं तो मुख्यमंत्री कमलनाथ व सरकार के मंत्री व विधायक सदन के भीतर और बाहर उन्हें समझाते रहे। सरकार को सदन में लेखानुदान मांगों पर मतविभाजन के दौरान भी विपक्ष के बहिगर्मन का सामना करना पड़ा।
भाजपा के हमलों पर बचाव की मुद्रा
अपनों और अपने सहयोगियों के अलावा विरोधी दल भाजपा के हमलों का कमलनाथ को ज्यादा सामना करना पड़ा, क्योंकि भाजपा में आंतरिक गुटबाजी से दल का हर वरिष्ठ नेता राष्ट्रीय नेतृत्व को अपनी ताकत बताने की कोशिश में लगा रहा। कांग्रेस सरकार की कर्जमाफी योजना पर भाजपा ने सबसे ज्यादा हमला किया, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को तीन बार जवाब देना पड़ा। लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद तो नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कमलनाथ सरकार को अल्पमत सरकार बताकर फ्लोर टेस्ट की मांग कर डाली।
सरकार को खजाना खाली होने की चुनौती मिली
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के मीडिया समन्वयक नरेंद्र सलूजा ने कहा कि कमलनाथ सरकार को कोई राजनीतिक चुनौती नहीं मिली। मगर भाजपा सरकार के 15 साल के कार्यकाल के बाद खजाना खाली मिला। इस चुनौती से जूझते हुए किसानों की दो लाख रुपए तक की कर्ज माफी के जैसे वचनों को पूरा किया। वृद्धावस्था पेंशन बढ़ाने, कन्या विवाह योजना की राशि बढ़ाने, युवाओं को रोजगार दिलाने जैसी चुनौती का सामना करना पड़ा।
बंटाढार और किसानों से धोखाधड़ी की सरकार
प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि छह माह के दौरान मुख्यमंत्री कमलनाथ ने प्रदेश को बंटाढार और किसानों से धोखाधड़ी वाली सरकार ही दी। बिजली, पानी, सड़क और कानून व्यवस्था के मामले में 15 साल की व्यवस्थाएं चौपट कर दी गईं। किसान कर्जमाफी के नाम पर धोखाधड़ी हुई और शून्य प्रतिशत ब्याज योजना को भी बंद करने के प्रयास हो रहे हैं।

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